Thursday, June 15, 2017

कहते हैं समन्दर अपने भीतर कुछ नहीं रखता ....


कहते हैं समन्दर अपने भीतर कुछ नहीं रखता 
लाख छुपाओ लहरों के साथ किनारे पे ला पटकता है 
ये यादें भी समन्दर की उन लहरों की तरह हैं 
जितना दूर जाती हैं फिर पलट कर उससे ज्यादा पास आती हैं 
किनारे पे खड़े पाँव से टकरा अपने वज़ूद का एह्सास दिलाती हैं 
जैसे कह रही हों, मैं तो यहीं हूँ, मैं गयी ही कहा थी 
यहीं तो हूँ इस किनारे की गीली मिटटी में, तुम्हारे पाँव मैं लिपटी टेकरी की उस रेत के पास 
पहाड़ी से टकराती इन लहरों के शोर में, लहरों से उड़ती इन पानी की बूदों में
देखो साँझ का वक़्त भी तो मेरी तरह ठहरा हुआ है, जब शाम और रात आपस मैं मिलते हैं 
इस वक़्त मैं अक्सर किनारे पर आती हूँ, मुझसे यूँ दूर न जाया करो 
उससे चंद दो घडी बतियाने बैठा, देखा तो सांझ की रात हो आयी थी 
आसमाँ में निकला वो पूनम का चाँद, समन्दर मैं जा बैठा जैसे मुँह चिढ़ा रहा था 
और समन्दर का वो नमकीन पानी आँखों से ओस बन कर गालों को भिगो रहा था 
चेहरे पे एक हँसी थी और एक ख्वाब था शायद, ख्वाब ही होगा वरना 
कहते हैं समन्दर अपने भीतर कुछ नहीं रखता 
लाख छुपाओ लहरों के साथ किनारे पे ला पटकता है ...

पुष्पेश पान्डेय 
16 जून 2017 

Saturday, January 21, 2017

यूँ तो तेरी जुदाई का गम भी कुछ कम नहीं ....................


यूँ  तो तेरी जुदाई का गम भी कुछ कम नहीं 
टपकती है आँखों से दुआ बन के जो 
वो मेरी याद में दुपट्टा तेरा तो नम नहीं 
यादें जो लिपटी हैं चारों ओर माशूक बन कर 
तेरे होने का अहसास कराती तो कुछ कम नहीं 
ढूंढा करते हैं जिस एहसास को बीते वक़्त के सायों में 
तन्हाई में महसूस अक्सर होता वो एहसास तो कुछ कम नहीं 
मिलते हैं आज भी उसी दीवानगी से टीले पे जो 
तुम हम जैसे ही कोई होंगे क्या हुआ जो तुम हम नहीं 
वो सर्द हवा जो आज भी भिगो देती है पलकों का तकिया  
उन यादों के बिछोने में सोया जागा होगा तू 
वरना यूँ नींद में उठ बैठ जाते तो हम नहीं 
यूँ  तो तेरी जुदाई.............................

पुष्पेश पान्डेय
21 जनवरी 2017 

Friday, January 6, 2017

उस मकान में सुकून पसरा पड़ा है ..........................



जिन्दगी की इस भागमभाग भरी आपाधापी में
सोचता हूँ जब उन बीते लम्हों को एकाकी में
देखता हूँ जो रोज एक नया बनने की चाह
या चुनता हूँ वो एक नया रास्ता चुनने की राह
इन अनगिनत चाहतों में खुद को भुला बैठा हूँ
चाहतों की इस चाहत मैं जो था वो गवां बैठा हूँ

वो सुकून जो पास था उन छोटे से कमरों में
नहीं पास जो इन बड़ी बिल्डिंगों मीनारों में
सुकून जो मिलता था वो हीरो हौंडा चलाने में
आज खोया खोया सा है इन सिडान को दौड़ाने में
उस छोटी गली के ऊपरी मंजिल के उन छोटे कमरों में
यादें जो साझा करि हैं कई उन भीड़ भरे गलियारों में

उन भीड़ भरी गलियों में छुपते छुपाते निकल जाने का सुकून
उन ऊपरी कमरों में खुद को पा जाने का सुकून
छोड़ आये जिसे जिंदगी की दौड़ में उस मकान में
खो सा गया जो शहर की बड़ी बड़ी मीनारों में
ढूंढते हैं जिसे अक्सर तकते हम सितारों में

पसरा है आज तक उस मकान की मुंडेरों में
कैंटीन की चाय में और पावरहाउस की उन दलेरों में
उन छोटी छोटी सीढ़ियों में या उन पहाड़ियों में
पीर की दरगाह में या झील की अंगड़ाइयों में

सोचा है इस बरस उस मकान की एक ईंट उधार लाऊंगा
खो गया जा पसरा है जो, वो सुकून साथ लाऊंगा
वो मकान  जिसमे आज भी वो सुकून पसरा पड़ा है

पुष्पेश पाण्डेय
जनवरी 6, 2017

Sunday, July 24, 2016

कुछ अजीब ही है ये साज् वक़्त का ..



कुछ अजीब ही है ये साज् वक़्त का
रुकता नहीं थकता नहीं, जब देखो बेवक़्त बजा करता है
कहीं इसमें सुरों का श्रृंगार है
कहीं विरह की टीस, तो कहीं खिलती किलकारियों की आवाज है
कुछ अजीब ही है ये साज् वक़्त का......
कभी यूँही सुनने बैठो तो दिल को छूने वाली आवाजें सुनाई दे जाती हैं
कभी कोई सोच हंसा  देती है तो कहीं कोई याद रुला देती है
हर नज़्म इसकी बीते पलों की आँख नम करा देती है
आज फिर देखो एक नज़म पुरानी सुनने  फिर से बैठ गया
प्यार भी है, गुस्सा भी, थोड़ी  हंसी तो कुछ आंसू भी
कुछ अजीब ही है ये साज् वक़्त का
रुकता नहीं थकता नहीं, जब देखो बेवक़्त बजा करता है

पुष्पेश पाण्डेय
24 जुलाई 2016 

Saturday, March 5, 2016

JNU के रण से...........................

आज के दौर के कन्हैया आजादी का बिगुल बजाते हैं
JNU के रण से ये अपना परचम लहराते हैं
मनुवाद को धताने वाले खुद जातिवाद फैलाते हैं
दलित का रोना ले ये मनुवाद बढ़ाते हैं
उसी मनुव्यवस्था के चलते जब आरक्षण मिले
तो ये कुछ सर्प विषैली जिह्वा लपलपाते  हैं
अपना तर्क साधने को ये आतंकियों को गुरु बनाते हैं
ये वो गरीब नहीं जो फैक्ट्री में या घर से दूर मेहनत कर अपना वक़्त बिताते हैं
न ही वो निर्धन जो एक वक़्त भूके रह अपनी माँ को खाना पहुँचाते हैं
ये देश की वो आवाज हैं जो सिर्फ मोदी को गरियाते हैं
चाहे वो किसी दलित की लाश हो या दलित कवच
ये अपना और अपने राजनीतिक गुरुओं का तर्क सधाते हैं
इन्होंने सेना को भी नहीं बक्शा उनके लिए ये फरमाते हैं
नहीं मिला होगा JNU में  एडमिशन इसीलिए वह जवान सर कटाते हैं
सर्प ही विषैले नहीं हमारे वहां कई मदारी भी पाये जाते हैं
जहां ऐसे सर्प भिनभिनायें वो बीन लिए दौड़े आते हैं
आखिर आने वाले इलेक्शन के गलियारे में युद्ध भी तो लड़ना है
आगे कोइ हथियार रख एक मसीहा भी तो बनना है
इतने वर्ष तुमने JNU को भोगा, नेता बने, बोलो क्या उपसंहार किया
देश के दलित छोड़ो अपनी छात्रवृत्ति से कितना खुद के परिवार का ही उद्धार किया
आज सुहानुभूति के लिए जिस ३००० रुपये पे काम करने वाली माँ और बीमार पिता का उद्घोषण देते हो
वर्ष मैं कितनी बार उस जीवनदायनी माँ के साक्षात दर्शन कर लेते हो
राजनीति की रोटी सेकने आये हो नेता बनोगे निकल जाओगे
28 तो निकाल  चुके और कितने वर्ष  लोगे, कि दलित उत्थान के लिए कुछ तो कर जाओगे
JNU जैसी यूनिवर्सिटी जिसमें कई मित्र पढ़े और कई उच्च पदों पे हैं डटे
परन्तु उसकी देखो निहरता आज इतने वर्षों में यह भी न कर सकी
छलावे तो कई देश को दिए परन्तु अम्बेडकर,  फुले का रिक्त स्थान न भर सकी। .......

पुष्पेश पाण्डेय
5 मार्च 2016








Sunday, February 7, 2016

काफी समय से लम्हा चुराकर कुछ लिख न पाया……..

लगता है कल की ही बात थी , देखा तो एक बरस  होने को आया
जीवन की आपा धापी मैं कुछ यूँ उलझा
काफी समय से लम्हा चुराकर कुछ लिख न पाया
सोचता हूँ लिखू भी तो क्या लिखूँ
वही मैं हूँ वही तुम हो, हाँ वक़्त कुछ बदल सा गया है
तकाजा गर करूँ वक़्त का तो यूँ तो बरसों हुए
बालों  की रंगत जो थोड़ी स्याह थी अब कुछ कुछ बदलने  लगी है
शायद मेरे कुछ ज्यादा  और  तुम्हारे थोड़े कम
वो अलग बात है  कि ख्वाबों में या अक्सर सामने जब कभी  तुम आते हो
 वैसे ही मिलते हो जैसे बरसों पहले तब मिले थे,
 वो जो एक रंग जो छाया था पहली मुलाकात में
आज भी वही गुलाबी रंग तुम्हरो गालों पे साफ़  दिखता है
वो शर्म हया का बुरका जो पहना था तब तुमने
जब पकड़ा था हाथ कभी, आज भी शकल पे तुम्हारी वो पोशीदा  है
कहाँ कुछ बदला वैसे ही तो दिखते हो
आज भी जब कभी झील किनारे मुस्कुराते मिलते हो
रूहें वही हैं कुछ भी न बदला, हाँ ये तो वक़्त का मिजाज है
अलबत्ता वही बदलता रहता है, पहिया है वक़्त का अनवरत घूमता रहता है
कितना भी चक्कर घूमे पर क्या बदल पायेगा उन  लम्हों को कभी
जिन्हे चुरा लिया था हमने उस वक़्त से उस मौके पर तब,
वो तो न बदले हैं न बदल पाएंगे चाह कर भी
सोचता हूँ उम्र के उस पड़ाव को जब होगा पोपला मुह
कमर टेढ़ी और ये सफ़ेद बाल भी साथ छोड़ जायेंगे
हम जैसे दीवाने क्या मुस्कुराते इस जग यूँ ही पाये जायेंगे
काफी वक़्त हुआ या  कहूँ कि बरस होने को आया
काफी समय से लम्हा चुराकर कुछ लिख न पाया……..

पुष्पेश पाण्डेय
8 फ़रवरी 2016

Monday, June 29, 2015

हडसन नदी के किनारे खड़े इस मैनहैटन शहर की १०० मंजिली इमारतें देख अक्सर सोचता हूँ................

हडसन नदी के किनारे खड़े इस मैनहैटन शहर की १०० मंजिली इमारतें देख अक्सर सोचता हूँ...
इनसे ऊँची तो वो चार मंजिला छत की मुंडेर थी जिसके किनारे खड़े हो दुनिया दिखा करती थी हमें 
या फिर इन बहुमंजिला इमारतों के मल्टी बेडरूम्स से अच्छा तो वो एक छोटा सा  कमरा था
जिसके छोटे पलंग पे नींद भी अच्छी थी और जिसमे देखे सपने इस दुनिया से कही सुन्दर होते थे
उन सपनों की रिमझिम बौछारों से जो सतरंगी इन्द्रधनुष बनाया था 
उस इन्द्रधनुष के रंगो को जीवन के लू के थपेड़ों ने धुन्दला सा बना दिया

कभी कीचड़ के पानी में छटपटाती हुई उस सुनहरी मछली को देखा है
जो पानी की वजह से जिन्दा भी है और कीचड़ से निकल भी नहीं पाती
जिंदगी भी कुछ वैसे ही हो गयी है जो जीवन की आपा-धापी से निकल नहीं पाती
और सामने जो जीवन रुपी सागर की लहरें पुकारती हैं उनमे समां भी नहीं पाती
एक लहर जो पानी की कभी के उस कीचड़ को धो सी जाती है
फिर से सपने बुनने लगता है मन जैसे फिर उसी छोटे से पलंग पे चैन की नींद गयी हो उसे
और फिर वही जीवन की आपा-धापी का चक्र शुरू हो जाता है
आज भी जब हडसन नदी के किनारे मैनहैटन शहर की १०० मंजिली इमारतें देख अक्सर सोचता हूँ

पुष्पेश पाण्डेय 
29 जून 2016