Thursday, August 1, 2013

उन चंद बूँदों ने एक याद सी दिला दी


आज फिर बारिश के मौसम में जो हवा चली, उन चलती हवाओं और पेशानी  पे जा गिरी चंद बूँदों ने एक याद सी दिला दी
वो चंद बूँदें बारिश की जो पेशानी से होते हुए यूँ कंधों पे जा गिरी

जैसे तुम गले लग के हो रोये और आँसू का इक कतरा तुम्हारे गालों से धुलक्ता कांधों पे जा गिरा हो कोइ
चलती हवाओं का वो तेज बेबाक रुख जैसे आ के तेजी से बाहों में समा रहा हो कोई

यूँ ही खड़ा रहा भीगता,  आज घंटों  तन्हा वहीं उन  खयालो के गदर में
गिरता सम्भलता यूँ ही हाथ मलता, सोचता झुंझ्लाता पानी में कुछ पुरानी तस्वीरें सी बनाता
कभी उस बारिश में खड़ा  ठहठहाता, यूँ ही हँसता और कभी उन बूँदों में भीगी पलकें छुपाता

फिर एक जोर की हवा चली वो चँद बूँदें उड़ा के ले गयी, सूरज निकला किरणें फूटी और नया एक जीवन सा खिल गया
पर वो बरसता बादल का टुकड़ा आसमान में जैसे एक खाली कोई पैबन्द सा सी गया
मैं देखता रहा आसमान को तकते यूँ ही फिर शाम गुजरी और चाँद निकल आया

मैंने बादलों के उस टुकड़े को अलविदा कहाओर नजरें झुका कंकड़ों में ठोकरें मारता घरको लौट आया
बरसात का मौसम था, फिर बादल आए, फिर बरसात हुई और में तकता रहा यूँ ही पर वो बादल का टुकड़ा ना आया
फिर सोचा कि हाँ जिंदगी भी तो है यूँ ही, साथ जो छोड़ गया राह् में कोई वो फिर कहां लौट के आया

तुम भी तो ना आए थे , जो गए थे अलविदा कह कर साथ चलते हुए, यूँ फिर मिलने, साथ चलने का वादा देकर
मैं खड़ा रहा वही उस मोड़ पर, जाने कितनी बरसाते आयीं, जाने कितने बादल आए
काले घने मतवाले से, जो लरज-गरजके बरसे, चीखे, गर्जे ओर चोंधीयाये

सिर उठा के जो देखा ऊपर तो उस मुस्कुराते बादल ने चंद बूँदें बारिश की मेरी पेशानी  पे गिरा दीं  
आज फिर बारिश के मौसम में जो हवा चली, उन चलती हवाओं और पेशानि पे जा गिरी चंद बूँदों ने एक याद सी दिला दी

(पेशानी  = Forehead)


पुष्पेश पाण्डेय 
Aug 01, 2013