Monday, May 31, 2010

Sand and Stone

जीवन भी अजब एक पहेली है
कभी गम में रुलाती कभी खुशियों में हसाती
अजब रूप नित नया दिखाती
चंचल शोख मतवाली ये सहेली है

गम के सभी धागों को बुनता रहा मैं
फिर एक दोपहर उस गम के ताने बाने को
रेत के ढेर पे लिखने बैठा और वक़्त यूँ ही बीतता रहा

मौसम खुशगवार था हवा कुछ मंद सी बहती थी
शाम की ओस मेरे होटों पे आकर दस्तक सी कुछ देती थी

याद आया गम तो देखा
बहती हवा के साथ मायूसी की उस दास्तान को
वो रेत की चादर नील चुकी थी

अब वहां ख़ामोशी थी, था मैं
और मायूसी से भरे मेरे मन मैं था एक अहसास
की जो भी वक़्त था अच्छा बुरा वो बीत गया
यूँ ही सोचते हुए कुछ वक़्त और गुजरा

आते सूरज की कुछ किरने दस्तक दिल पे देती थी
एक नए सवेरे की राहत बची हुई मायूसी को मिटाती थी
और जीवन चक्र नयी आशा के साथ एक नयी सुबह की और
फिर उसी तरह हसता मुस्कुराता घूमता जाता था

कैद करता हूँ उन खुशगवार लम्हों को
पत्थरे संगमरमर में
जो कभी याद आता है वो सूनी रेत का ढेर
खुद को उन पथ्थरो पे बैठा पता हूँ
और दूर रेत के ढेर की बदलती सलवटों को देख मुस्कुराता हूँ