Sunday, December 7, 2025

आज लिखने बैठा तो सोचा कि क्या लिखूँ ....................

 आज लिखने बैठा तो सोचा कि क्या लिखूँ 

तुझे लिखूं या कोई फलसफा नया लिखूँ 

सोचने जो लगा तुझे तो याद एक सुनहरी आयी 

याद जो  किया तो जाने कितनी शाम दुपहरी आयी 

वो कैंटीन का फ़साना या चाय गरम का जमाना 

खो गया लगता है इस ठंड के कोहरे मैं 

या कही आज भी बैठा अलाव तापता होगा दोपहरे में 

खो गया कहीं जो ढूंढ़ने बैठा उसे 

याद फिर वो शाम सुनहरी आयी 

वो सनसेट के रंग वो दो जिस्म एक हम 

वो प्रकृति के रंग में रचे घुले हम 

आज लिखने बैठा तो सोचा कि क्या लिखूँ 

तुझे लिखूं या कोई फलसफा नया लिखूँ 


पुष्पेश पांडेय 

7 दिसंबर 2025 

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