Tuesday, April 27, 2021

कल फिर चाँद से रात भर आँख मिचोली होती रही

 कल फिर चाँद से रात भर आँख मिचोली होती रही 

वो मुँह चिढ़ाता रहा और आँखे दामन भिगोती रहीं 


Saturday, April 17, 2021

वो जन्मदिन याद है तुमको

 वो जन्मदिन याद है तुमको जब एक प्याली से चाय को पिया था

बारी बारी एक एक घूंट हमने जीवन अमृत को बाँट लिया था

वो जो तुम्हारे होठों की शोखी उस प्याली में कैद हुई थी

उसको अगली घूंट में मैंने जैसे खुद में भर लिया था

 वो उस जन्मदिन की छोटी सी मुलाक़ात

उन लम्हो में  की अनकहे लफ्जों की जाने कितनी बात

ऐसे छोटे बड़े  जाने कितनी मुलाकातों के उपहार मैंने संजों रखे हैं

जीता हूँ उन्हें अक्सर, लम्हे जो यादों की तिजोरी मैं महफूज़  रखे हैं

 यूँ तो सदा ही दुनिया ने जाने कितनी बंदिशें लगायी हैं

पर क्या कभी  राधा और श्याम में विरह भी हो पायी है

आज भी नंदीवन में शाम को मानो मेला सा लग जाता है

जब हो शाम तो आकर श्याम राधा संग रास रचाता है

न श्याम बिन राधा, न बिना राधा हो श्याम पूरा

मैं तुम हम अधूरे एक दूजे बिन जीवन बहुत अधूरा

है विश्वास एक होंगे प्रेम में और रहेंगे संग अनंत

प्रेम बंधन की डोर में जो बँधे, इस रिश्ते का नहीं कोई अंत

वर्षों बीते विरह की चक्की पे पिस के कई परीक्षाओं से मुखर 

साथ रहेंगे अब हम मिलेंगे अब इसी राह पर शेष जीवन  अग्रसर 


पुष्पेश पांडेय

16 april 2021

Monday, February 15, 2021

सुबह से थोड़ा मुस्कुरा क्या दिए हम ...शाम आते आते खुद को खुद की नजर लगा बैठे ...

 सुबह से थोड़ा मुस्कुरा क्या दिए हम 

शाम आते आते खुद को खुद की नजर लगा बैठे 

चिराग़ राहों में बिछाये थे मिलने के इंतज़ार के 

शाम को वही चिराग़ दामन हमारा जला बैठे 

न हो मायूस के मौक़े और भी आएंगे इश्क़ में 

ये जिंदगी है इसे हमे तड़पाने में भी मजा आता होगा 

दर्द भी मायूस हो जाता होगा हमे देख के 

जब दर्द में हमे तेरी तस्वीर पे मुस्कुराता पाता होगा 

सोचता होगा किस मिटटी से बनाया इन दोनों को 

न मिटने वाली मुहब्बत की वो मिट्टी  कहाँ ढूंढ पाता होगा 

सुबह से थोड़ा मुस्कुरा क्या दिए हम 

शाम आते आते खुद को खुद की नजर लगा बैठे .....


पुष्पेश पांडेय 

16 फरवरी 2021 

Monday, January 25, 2021

तुम साथ हो मेरे सदा......

एक आस जो है मन में बसी 

और एक विश्वास है कि तुम साथ हो मेरे सदा

कई कई बार बेवजह हँसता रहता हूँ 

बतियाता हूँ लड़ पड़ता हूँ 

सोचता हूँ तुम्हें तो फिर मुस्कुराता हूँ 

याद करता हूँ तो खो जाता हूँ 

यूँ तो कोई नहीं रिश्ता तेरा मेरा 

पर सब रिश्तों से बढ़कर है 

जिए हैं  जीते हैं  जो कुछ एक पल 

वो इस सारे जीवन से बढ़ कर है 

मन पंख लगाए उड़ चलता है 

कभी मिलने के विचार से हिरन सी कुचाल भरता है 

तो कभी विरह की वेदना में पीर से नीर गढ़ता है 

नहीं टूटती तो एक आस जो है मन में बसी 

और एक विश्वास है कि तुम साथ हो मेरे सदा



पुष्पेश पांडेय 

25 जनवरी 2021 

Wednesday, December 23, 2020

कौन कम्बखत कहता है कि इश्क़ मुकम्मल नहीं होता..........

 

कौन कम्बखत कहता है कि इश्क़ मुकम्मल नहीं होता

उस आशिक़ से पूछो जो रोज़ इश्क़ की पायदान पे चढ़ता है

रोज गिरता है गिर के उठता है ख्याल में हमसफ़र के अपने

रोज एक नया ख़्वाब का आशियाँ बुन इश्क़ में आगे बढ़ता है

 

रोज रोज जो ग़म के गर्त मैं गोते न लगाए तो क्या ख़ाक इश्क़ किया

रोज रोज जो ग़म के गर्त मैं गोते न लगाए तो क्या ख़ाक इश्क़ किया

इश्क़ तो सजदा है पीर का प्रेम है मीरा का या दीवानगी है खुसरो की

जब ये दुनिया वाले उन्हें न समझ सके तो आप यार किनसे उम्मीद जगाये बैठे हैं

 

ये तो फन है उन दिलवालों का जो रोज टूटते जुड़ते सपनो में भी

ख्याल बुना करते हैं, जीते हैं लम्हे जो गुजरेंगे कभी, सोते हैं तो महबूब का दीदार कर

और फिर  सुबह उठकर उसी का अक्स देख उसका दामन थाम लेते हैं

जमाना उन्हें दीवाना कहता है और उसी तरह उनके बदइंतज़ाम करता है

 

फिर चाहे सूर का दोहा हो  मीरा का भजन या अमीर खुसरो की दीवानगी

जनाब आशिक़ी भी भला कभी इस दुनिया को गवार गुज़री है

चिनवा दिए गए कई इमारतों में तो कई दौलतों की भेंट चढ़े

जो न निपटे उन्होंने ख्वाब बुने वो ख्वाबों की नगरी दौड़ चले

 

मेरा इश्क़ तुम्हारे लिए बेशकीमती था कीमत लग न सकी उसकी

तो उसे सहेज के दिल की तिजोरी में बंद कर रख छोड़ा है

किसी कंजूस बनिए की तरह अपनी वो दौलत सहेज के रखता हूँ

जब भी गिनता हूँ उसे कभी अकेले महफूज तन्हाई में

हर बार बढ़ा हुआ ही पता हूँ खुश हो जाता हूँ ये देख

 

के दौलत कम नहीं हुई थोड़ी भी ,जब करो हिसाब ये बेहिसाब बढ़ती जाती है

रंग चढ़ सका न दुनिया का जिस रंग पे, उस रंग से मैंने तेरी मोहब्बत को भिगो दिया है

सुना तो है पर कौन कम्बखत कहता है कि इश्क़ मुकम्मल नहीं होता

आ के देखो दुनिया आशिक़ की, कि किस ख़ूबसूरती से इसे मुकम्मल किया है


पुष्पेश पांडेय 

23 दिसंबर 2020 

Friday, November 6, 2020

इंजीनियरिंग क्या चुनी वक़्त मानो थम सा गया है.........

 एक कामयाब आशिक़: तुम साथ होती हो तो वक़्त ठहर सा जाता है


नाकामयाब आशिक़: तुम्हारे बिना मनो वक़्त थम सा गया है

आईटी इंजीनियर: इंजीनियरिंग क्या चुनी वक़्त मानो थम सा गया है, कॉलेज के साथ जिंदगी ने लेनी शुरू की, तब से ये सिलसिला बदस्तूर जारी है


पुष्पेश पांडेय
6 नवंबर 2020

Wednesday, November 4, 2020

आस्तीन में साँप ....

 पाले हैं आस्तीन में साँप जाने कितने 

नरम खाल में ज़हरीले दाँत निपोड़े बैठे हैं 


पुष्पेश पांडेय 

नवंबर 11 2020 

Monday, April 20, 2020

आज जब बिजी हुआ इस लॉकडाउन के दौरान मैं

आज जब बिजी हुआ इस लॉकडाउन के दौरान मैं
एक ख्वाब को सहेज के बंद करने लॉकर में गया
खोला जो दरवाजा लॉकर का तो कुछ ख्वाब गिर पड़े

उन्हें सँभालने बैठा तो एक सिलसिला सा शुरू हो गया
जीवन की इस आपाधापी में कई लम्हे जो गुजर गए
वो सामने बिखरे पड़े  थे, गुजरे लम्हे जो गुजारे ही नहीं कभी

सिर्फ संजों के रख दिया था कि  फिर कभी जियेंगे
वो ख्वाब जो किसी जरूरत की नियामत चढ़ गए
कभी अपनी तो अक्सर चाहने वालों की चाह में आगे बढ़ गए

हम उन्हें लॉकर में सहेज के संभाल के बंद करते आये
सोचते थे कभी फुर्सत से इन्हे पढ़ेंगे  इन्हे उठाएंगे
एक एक कर फिर वही लम्हा जियेंगे और मुस्कुरायेंगे

आज वो तमाम ख्वाब और लम्हे सवाल पूछते हैं जिन्हे सहेज के रखा था
की वो लम्हा कब आएगा, कब इस कल की दौड़ को छोड़ तू आज पे आएगा
तू आज इस वक़्त पे मुस्कुराएगा, क्यू नहीं इसी पल से तू आज को अपनाएगा

सोच ही रहा था कि फ़ोन पे अगली मीटिंग का रिमाइंडर मुस्कुरा दिया
हमने फिर से उन ख्वाब और लम्हो को पुलिंदा उठाया और सहेज के लॉकर में सजा दिया
आज जब बिजी हुआ इस लॉकडाउन के दौरान मैं

पुष्पेश पांडेय

Sunday, March 1, 2020

न गिला न शिक़वा न सवाल न ज़वाब

न गिला न शिक़वा न सवाल न ज़वाब
बस यूँ ही ख़ामोश हैं, डूबे हैं ख़ुद में थोड़े से
थोड़ी तन्हाई बटोर लाए हैं अपने हिस्से की
उसी की पैमाइश में मशरूफ़ हैं थोड़े से 

Thursday, January 30, 2020

जीवन क्या है एक दरिया बहता सा ......

जीवन क्या है
एक दरिया बहता सा
अनवरत समय की ढाल पे
कुछ यादें संजोये हुए
यादें कुछ बीते लम्हो की
या उन पलों की जो रुक से गए हैं
वक़्त जहाँ बढ़ता नहीं रुक सा गया है
समय की पदचाप थम सी गयी है
कुछ लम्हें जो जीते हैं अक्सर
बीते वक़्त की गहरायी में
वक़्त जहाँ रुक सा गया है
पर जीवन रुकता नहीं बहता रहता है
अनवरत समय की ढाल पे
कुछ यादें संजोये हुए

पुष्पेश पांडेय
30 जनवरी 2020

Friday, May 3, 2019

आ ज़िन्दगी बैठ हम कुछ बात करें ..................................


आ ज़िन्दगी बैठ हम कुछ बात करें
आ साथ बैठ एक नूतन वर्ष खोलें
फिर एक  नवजीवन की शुरुआत करें
आ ज़िन्दगी बैठ हम कुछ बात करें

कुछ खट्टे मीठे लम्हो की बरसी पे
हर्षोउल्लास की सुरलहरी से सतरंगी एक शुरुआत करें
आ ज़िन्दगी बैठ हम कुछ बात करें
कुछ बीते कुछ आने वाले लम्हों को भूल
इस एक पल को खुल के जीने की शुरुआत करें
आ जिंदगी बैठ हम कुछ बात करें

जियें कुछ यूँ हर पल के वो आखिरी हो
न आने वाले पल की चिंता न बीते क्षण का कोई प्रहरी हो
सामने है जो क्षण वही बड़ा दिन, दिवाली, अफ्तार और सहरी हो
जीवन से कुछ भर दे यूँ उस क्षण को कि काल की गति भी उस पल पे जा ठहरी  हो
उस मीरा के विशुद्ध प्रेम, उस कान्हा  की बंसी, उस राधा की बात करें
आ जिंदगी बैठ हम कुछ बात करें

पुष्पेश पाण्डेय
3 मई 2019 

Thursday, August 16, 2018

याद तुम बहुत आओगे अटल। (a homage to one one of my favorite leaders)


याद तुम बहुत आओगे अटल
नाम जैसे ही अटल थे तुम्हारे विचार और इरादे
राजनीति पश्चात, राष्ट्र सर्वोपरि का पाठ तुम सदा पढ़ाते
तुम्हारी ही छत्रछाया में  कितने कवि पढ़  गए
कितने राजनेता, राजनीति की सीढ़ी चढ़ गए
वृक्ष से अटल तुम अपनी छाँव में सबका पालन करते रहे
विपक्ष हो या सर्वोच्च पद बिन लालसा राष्ट्रसेवा करते रहे
यूएन में जा हिंदी में  जो गूंजा वो सिंहनाद भी तुम्ही थे
कौशल वक्ता हो या मौत से टक्कर लेता कवि भी तुम्ही थे
नेता राज नेता तो और भी आयेंगे फिर पद पे कोई शिरोधार्य होगा
एक आशा कि तुम फिर लौटोगे, तुम्हारी ही बाट जोहेंगे, अटल तुम्हारा सदा इंतज़ार होगा


याद तुम बहुत आओगे अटल


पुष्पेश पाण्डेय
16 अगस्त 2018 

Tuesday, August 14, 2018

एक बेटी की आजादी......


अखबार की हैडलाइन पढ़ते  ही जोर की चित्कार आयी
कहीं युवती, कहीं वृद्धा या कहीं साल और छह माह की बच्ची थी ये आवाज आयी
कुंठित समाज का पहिया विध्वन्स की तरफ जा रहा है
कौन बचाएगा इस मानव रूपी सर्प से, हर पिता को यही दंश सत्ता रहा है
स्वतंत्रता अपनी बहत्तरवीं  वर्षगाँठ की ओर अग्रसर हो रही है
त्रसित नारी, घुट घुट कर आज भी आजादी की बाट जोह रही है
कुछ ख़बरें राजनेताओं और अख़बारों के लिए मसाला हैं तो चर्चाए आम हैं
कहीं बलात्कार, कहीं हलाला और कितनी ही विसंगतियों से जाने कितनी बहनें आज भी कुर्बान हैं
जन्म से बधिर अभिषप्त समाज को इनकी चीत्कार सुनायी नहीं देती
व्यसन मैं लिप्त कितने भाई पिता भुला बैठे हैं बहन, रिश्ते, माँ और अपनी ही बेटी
जिस समाज के ठेकेदारों द्वारा बेटी का चरित्र उसके कपड़ो की लम्बाई से मापा जाता हो
काश उस अस्सी वर्ष की माँ और तीन माह की बेटी की भी कोई नेता टीका टिपण्णी कर पाता हो
इस कुंठित बधिर नपुंसक समाज को आजादी का शोर सुनाने किसी दिन कोई भगत सिंह, राजगुरु भी आएगा
उस दिन के इंतज़ार मैं हैं देश की बेटियां जब उन्हें स्वतंत्रता का हक़ मिल पायेगा

पुष्पेश पान्डेय

14 अगस्त 2018