Monday, April 20, 2020

आज जब बिजी हुआ इस लॉकडाउन के दौरान मैं

आज जब बिजी हुआ इस लॉकडाउन के दौरान मैं
एक ख्वाब को सहेज के बंद करने लॉकर में गया
खोला जो दरवाजा लॉकर का तो कुछ ख्वाब गिर पड़े

उन्हें सँभालने बैठा तो एक सिलसिला सा शुरू हो गया
जीवन की इस आपाधापी में कई लम्हे जो गुजर गए
वो सामने बिखरे पड़े  थे, गुजरे लम्हे जो गुजारे ही नहीं कभी

सिर्फ संजों के रख दिया था कि  फिर कभी जियेंगे
वो ख्वाब जो किसी जरूरत की नियामत चढ़ गए
कभी अपनी तो अक्सर चाहने वालों की चाह में आगे बढ़ गए

हम उन्हें लॉकर में सहेज के संभाल के बंद करते आये
सोचते थे कभी फुर्सत से इन्हे पढ़ेंगे  इन्हे उठाएंगे
एक एक कर फिर वही लम्हा जियेंगे और मुस्कुरायेंगे

आज वो तमाम ख्वाब और लम्हे सवाल पूछते हैं जिन्हे सहेज के रखा था
की वो लम्हा कब आएगा, कब इस कल की दौड़ को छोड़ तू आज पे आएगा
तू आज इस वक़्त पे मुस्कुराएगा, क्यू नहीं इसी पल से तू आज को अपनाएगा

सोच ही रहा था कि फ़ोन पे अगली मीटिंग का रिमाइंडर मुस्कुरा दिया
हमने फिर से उन ख्वाब और लम्हो को पुलिंदा उठाया और सहेज के लॉकर में सजा दिया
आज जब बिजी हुआ इस लॉकडाउन के दौरान मैं

पुष्पेश पांडेय

Sunday, March 1, 2020

न गिला न शिक़वा न सवाल न ज़वाब

न गिला न शिक़वा न सवाल न ज़वाब
बस यूँ ही ख़ामोश हैं, डूबे हैं ख़ुद में थोड़े से
थोड़ी तन्हाई बटोर लाए हैं अपने हिस्से की
उसी की पैमाइश में मशरूफ़ हैं थोड़े से 

Thursday, January 30, 2020

जीवन क्या है एक दरिया बहता सा ......

जीवन क्या है
एक दरिया बहता सा
अनवरत समय की ढाल पे
कुछ यादें संजोये हुए
यादें कुछ बीते लम्हो की
या उन पलों की जो रुक से गए हैं
वक़्त जहाँ बढ़ता नहीं रुक सा गया है
समय की पदचाप थम सी गयी है
कुछ लम्हें जो जीते हैं अक्सर
बीते वक़्त की गहरायी में
वक़्त जहाँ रुक सा गया है
पर जीवन रुकता नहीं बहता रहता है
अनवरत समय की ढाल पे
कुछ यादें संजोये हुए

पुष्पेश पांडेय
30 जनवरी 2020

Friday, May 3, 2019

आ ज़िन्दगी बैठ हम कुछ बात करें ..................................


आ ज़िन्दगी बैठ हम कुछ बात करें
आ साथ बैठ एक नूतन वर्ष खोलें
फिर एक  नवजीवन की शुरुआत करें
आ ज़िन्दगी बैठ हम कुछ बात करें

कुछ खट्टे मीठे लम्हो की बरसी पे
हर्षोउल्लास की सुरलहरी से सतरंगी एक शुरुआत करें
आ ज़िन्दगी बैठ हम कुछ बात करें
कुछ बीते कुछ आने वाले लम्हों को भूल
इस एक पल को खुल के जीने की शुरुआत करें
आ जिंदगी बैठ हम कुछ बात करें

जियें कुछ यूँ हर पल के वो आखिरी हो
न आने वाले पल की चिंता न बीते क्षण का कोई प्रहरी हो
सामने है जो क्षण वही बड़ा दिन, दिवाली, अफ्तार और सहरी हो
जीवन से कुछ भर दे यूँ उस क्षण को कि काल की गति भी उस पल पे जा ठहरी  हो
उस मीरा के विशुद्ध प्रेम, उस कान्हा  की बंसी, उस राधा की बात करें
आ जिंदगी बैठ हम कुछ बात करें

पुष्पेश पाण्डेय
3 मई 2019 

Thursday, August 16, 2018

याद तुम बहुत आओगे अटल। (a homage to one one of my favorite leaders)


याद तुम बहुत आओगे अटल
नाम जैसे ही अटल थे तुम्हारे विचार और इरादे
राजनीति पश्चात, राष्ट्र सर्वोपरि का पाठ तुम सदा पढ़ाते
तुम्हारी ही छत्रछाया में  कितने कवि पढ़  गए
कितने राजनेता, राजनीति की सीढ़ी चढ़ गए
वृक्ष से अटल तुम अपनी छाँव में सबका पालन करते रहे
विपक्ष हो या सर्वोच्च पद बिन लालसा राष्ट्रसेवा करते रहे
यूएन में जा हिंदी में  जो गूंजा वो सिंहनाद भी तुम्ही थे
कौशल वक्ता हो या मौत से टक्कर लेता कवि भी तुम्ही थे
नेता राज नेता तो और भी आयेंगे फिर पद पे कोई शिरोधार्य होगा
एक आशा कि तुम फिर लौटोगे, तुम्हारी ही बाट जोहेंगे, अटल तुम्हारा सदा इंतज़ार होगा


याद तुम बहुत आओगे अटल


पुष्पेश पाण्डेय
16 अगस्त 2018 

Tuesday, August 14, 2018

एक बेटी की आजादी......


अखबार की हैडलाइन पढ़ते  ही जोर की चित्कार आयी
कहीं युवती, कहीं वृद्धा या कहीं साल और छह माह की बच्ची थी ये आवाज आयी
कुंठित समाज का पहिया विध्वन्स की तरफ जा रहा है
कौन बचाएगा इस मानव रूपी सर्प से, हर पिता को यही दंश सत्ता रहा है
स्वतंत्रता अपनी बहत्तरवीं  वर्षगाँठ की ओर अग्रसर हो रही है
त्रसित नारी, घुट घुट कर आज भी आजादी की बाट जोह रही है
कुछ ख़बरें राजनेताओं और अख़बारों के लिए मसाला हैं तो चर्चाए आम हैं
कहीं बलात्कार, कहीं हलाला और कितनी ही विसंगतियों से जाने कितनी बहनें आज भी कुर्बान हैं
जन्म से बधिर अभिषप्त समाज को इनकी चीत्कार सुनायी नहीं देती
व्यसन मैं लिप्त कितने भाई पिता भुला बैठे हैं बहन, रिश्ते, माँ और अपनी ही बेटी
जिस समाज के ठेकेदारों द्वारा बेटी का चरित्र उसके कपड़ो की लम्बाई से मापा जाता हो
काश उस अस्सी वर्ष की माँ और तीन माह की बेटी की भी कोई नेता टीका टिपण्णी कर पाता हो
इस कुंठित बधिर नपुंसक समाज को आजादी का शोर सुनाने किसी दिन कोई भगत सिंह, राजगुरु भी आएगा
उस दिन के इंतज़ार मैं हैं देश की बेटियां जब उन्हें स्वतंत्रता का हक़ मिल पायेगा

पुष्पेश पान्डेय

14 अगस्त 2018

Saturday, February 3, 2018

मुझसे पूछा न करो याद करते हैं गर तुमको हम


मुझसे पूछा करो याद करते हैं गर तुमको हम
याद आने के लिए भुलाना भी तो मुमकिन  नहीं मुनासिब भी नहीं
भूले ही कब थे जो याद करें तुमको हम 
गर कोई लम्हा जीना हो तो जी लेते हैं उन बीते लम्हो को ख्यालों  में
अपनी ही दुनिया के मीर हैं, उस बस्ती में आज भी हमारा हुक्म चलता है
वक़्त की धूल को रोक कर रखा है उस जहाँ में जाने से हमने
सो जो बीता ही नहीं वो क्या कर भूलेंगे और क्या याद करेंगे
मीर ने अपनी ही दुनिया सजा रख्खी है कभी आओ तो सैर पे ले जायेंगे
वक़्त की लगाम को थाम इस शहंशाही का लुत्फ़ तुमको भी दिलवाएंगे
तुम जो आये थे कभी जाने की कसम लेकर
कर देखो आज तलक उस कसम को हमने निभा रखा है
वो लम्हा जो वक़्त के बटुए से चुराया था कभी
दरगाह की चादर सा पाक उसी रौशनी से सजा रखा है
मुझसे पूछा करो याद करते हैं गर तुमको हम..................


पुष्पेश पांडेय 
4 फरवरी 2018





Tuesday, October 31, 2017

खाली हाथ कहाँ रोते हुए आये थे ज़माने में .........


खाली हाथ कहाँ रोते हुए आये थे ज़माने में
दोनों हथेलियों में मुठ्ठी बंद उम्र बटोरी थी खुदा से
दौलते ख्वाइश जमा करते हमें देख खुदा यूँ ही मुस्कराता रहा
और वो बेवफा कम्बख्त उम्र हाथ से यूँ ही फिसलती रही


पुष्पेश पान्डेय
31 अक्टूबर 2017

Sunday, September 24, 2017

बैठ तनहा स्टेशन की टूटी बेंच पर अक्सर .....

बैठ तनहा स्टेशन की टूटी बेंच पर अक्सर
वो आती जाती ट्रेनें ताका करता
रोज वही ट्रेनें आती, वापस जाते देख जिन्हें मुस्काता
सोचता बड़बड़ाता, हँसता और फिर मायूस हो लौट जाता
सर्दी की सर्द रातों में अक्सर जो नींद का दामन छूटा पाता
या दूर किसी याद की रजाई से एक पाँव ठण्ड में  बाहर निकल जाता
बैचैन हो उठता कंपकपाता और जा बैठता फिर वही यादों की रजाई ओढे
किसी मजार पे लगे पुराने दरखत से बनी उसी पुरानी बेंच पर
कोई ट्रेन पुरानी छूट गयी हो जैसे, शायद जिसे  पकड़ना चाहता है
अब भी ढूंढा करता है, रोज़  आकर,  इंतज़ार  में सब्र टटोला करता है
जो कुछ ट्रेनें वापस को जातीं उनमे अक्सर वो झट चढ़ जाता
एक दो कुछ स्टेशन सही कुछ लम्हें  वक़्त रोक वो यूँ ही बिताता
बैठ तनहा स्टेशन की टूटी बेंच पर  अक्सर.......


पुष्पेश  पांडेय
25 सितम्बर 2017

Thursday, June 15, 2017

कहते हैं समन्दर अपने भीतर कुछ नहीं रखता ....


कहते हैं समन्दर अपने भीतर कुछ नहीं रखता 
लाख छुपाओ लहरों के साथ किनारे पे ला पटकता है 
ये यादें भी समन्दर की उन लहरों की तरह हैं 
जितना दूर जाती हैं फिर पलट कर उससे ज्यादा पास आती हैं 
किनारे पे खड़े पाँव से टकरा अपने वज़ूद का एह्सास दिलाती हैं 
जैसे कह रही हों, मैं तो यहीं हूँ, मैं गयी ही कहा थी 
यहीं तो हूँ इस किनारे की गीली मिटटी में, तुम्हारे पाँव मैं लिपटी टेकरी की उस रेत के पास 
पहाड़ी से टकराती इन लहरों के शोर में, लहरों से उड़ती इन पानी की बूदों में
देखो साँझ का वक़्त भी तो मेरी तरह ठहरा हुआ है, जब शाम और रात आपस मैं मिलते हैं 
इस वक़्त मैं अक्सर किनारे पर आती हूँ, मुझसे यूँ दूर न जाया करो 
उससे चंद दो घडी बतियाने बैठा, देखा तो सांझ की रात हो आयी थी 
आसमाँ में निकला वो पूनम का चाँद, समन्दर मैं जा बैठा जैसे मुँह चिढ़ा रहा था 
और समन्दर का वो नमकीन पानी आँखों से ओस बन कर गालों को भिगो रहा था 
चेहरे पे एक हँसी थी और एक ख्वाब था शायद, ख्वाब ही होगा वरना 
कहते हैं समन्दर अपने भीतर कुछ नहीं रखता 
लाख छुपाओ लहरों के साथ किनारे पे ला पटकता है ...

पुष्पेश पान्डेय 
16 जून 2017 

Saturday, January 21, 2017

यूँ तो तेरी जुदाई का गम भी कुछ कम नहीं ....................


यूँ  तो तेरी जुदाई का गम भी कुछ कम नहीं 
टपकती है आँखों से दुआ बन के जो 
वो मेरी याद में दुपट्टा तेरा तो नम नहीं 
यादें जो लिपटी हैं चारों ओर माशूक बन कर 
तेरे होने का अहसास कराती तो कुछ कम नहीं 
ढूंढा करते हैं जिस एहसास को बीते वक़्त के सायों में 
तन्हाई में महसूस अक्सर होता वो एहसास तो कुछ कम नहीं 
मिलते हैं आज भी उसी दीवानगी से टीले पे जो 
तुम हम जैसे ही कोई होंगे क्या हुआ जो तुम हम नहीं 
वो सर्द हवा जो आज भी भिगो देती है पलकों का तकिया  
उन यादों के बिछोने में सोया जागा होगा तू 
वरना यूँ नींद में उठ बैठ जाते तो हम नहीं 
यूँ  तो तेरी जुदाई.............................

पुष्पेश पान्डेय
21 जनवरी 2017 

Friday, January 6, 2017

उस मकान में सुकून पसरा पड़ा है ..........................



जिन्दगी की इस भागमभाग भरी आपाधापी में
सोचता हूँ जब उन बीते लम्हों को एकाकी में
देखता हूँ जो रोज एक नया बनने की चाह
या चुनता हूँ वो एक नया रास्ता चुनने की राह
इन अनगिनत चाहतों में खुद को भुला बैठा हूँ
चाहतों की इस चाहत मैं जो था वो गवां बैठा हूँ

वो सुकून जो पास था उन छोटे से कमरों में
नहीं पास जो इन बड़ी बिल्डिंगों मीनारों में
सुकून जो मिलता था वो हीरो हौंडा चलाने में
आज खोया खोया सा है इन सिडान को दौड़ाने में
उस छोटी गली के ऊपरी मंजिल के उन छोटे कमरों में
यादें जो साझा करि हैं कई उन भीड़ भरे गलियारों में

उन भीड़ भरी गलियों में छुपते छुपाते निकल जाने का सुकून
उन ऊपरी कमरों में खुद को पा जाने का सुकून
छोड़ आये जिसे जिंदगी की दौड़ में उस मकान में
खो सा गया जो शहर की बड़ी बड़ी मीनारों में
ढूंढते हैं जिसे अक्सर तकते हम सितारों में

पसरा है आज तक उस मकान की मुंडेरों में
कैंटीन की चाय में और पावरहाउस की उन दलेरों में
उन छोटी छोटी सीढ़ियों में या उन पहाड़ियों में
पीर की दरगाह में या झील की अंगड़ाइयों में

सोचा है इस बरस उस मकान की एक ईंट उधार लाऊंगा
खो गया जा पसरा है जो, वो सुकून साथ लाऊंगा
वो मकान  जिसमे आज भी वो सुकून पसरा पड़ा है

पुष्पेश पाण्डेय
जनवरी 6, 2017

Sunday, July 24, 2016

कुछ अजीब ही है ये साज् वक़्त का ..



कुछ अजीब ही है ये साज् वक़्त का
रुकता नहीं थकता नहीं, जब देखो बेवक़्त बजा करता है
कहीं इसमें सुरों का श्रृंगार है
कहीं विरह की टीस, तो कहीं खिलती किलकारियों की आवाज है
कुछ अजीब ही है ये साज् वक़्त का......
कभी यूँही सुनने बैठो तो दिल को छूने वाली आवाजें सुनाई दे जाती हैं
कभी कोई सोच हंसा  देती है तो कहीं कोई याद रुला देती है
हर नज़्म इसकी बीते पलों की आँख नम करा देती है
आज फिर देखो एक नज़म पुरानी सुनने  फिर से बैठ गया
प्यार भी है, गुस्सा भी, थोड़ी  हंसी तो कुछ आंसू भी
कुछ अजीब ही है ये साज् वक़्त का
रुकता नहीं थकता नहीं, जब देखो बेवक़्त बजा करता है

पुष्पेश पाण्डेय
24 जुलाई 2016