इश्क क्या है
मज्हब है किसी मुल्क का
या गाली है एक समाज की
दुआ है किसी पीर की
या श्राप किसी साधू का
जीने वाले तो इसे मज्हब की तरह जीते हैं
दुनिया वाले इसे एक गाली समझते हैं
और इश्क करने वाले दीवाने, दुआ किसी फ़कीर की
जाने क्या बात है इसमें, हर लम्हा दर्द चाहता है
फिर भी ये वो नशा है जो कोई दीवाना छोड़ने को तैयार नहीं
जब साथ होते हैं तो जुदाई का वो ख्याल दर्द देता है
और जुदाई के बाद उम्र भर साथ न रहने का गम साथ रहता है
फिर भी लोग इस मह को दीवानों की तरह पीते हैं
कोई भी हाल हो इश्क करते और मुस्कुराते हुए जीते हैं
मैंने भी किया था इश्क कभी. आज भी उन लम्हों को जीता हूँ
जाने क्या सोचता हूँ थोड़ी भुलाता और कुछ ज्यादा पीता हूँ
कुछ भी तो याद नहीं ऐसा जो मैं भुला पाया हूँ
वो लम्हे जो हैं कुछ बीते हुए उन्हें तब भी जिया था आज भी जी रहा हूँ
जाता हूँ आज भी जब उस पीर की दरगाह पे जहाँ दुआ माँगी थी हमने साथ होने की
देखता हूँ कि मजहब नहीं बदला बस किरदार बदल गए हैं
आज भी वहाँ कोई पुष्पेश दुआ माँगता, धागा बाँधता सा दिख पड़ता है
और कोई तुम जैसा साथ आता, चादर चडाता सा दिख पड़ता है
मजहब ही है कोई जो लोग आज भी जी रहे हैं या
दुआ है किसी पीर की मह में डुबोई हुई
जिसे कल भी उसी कशिश से पिया था और आज भी उसी मज्हब की तरह पी रहे हैं
पुष्पेश
नवम्बर 5th 2009
Thursday, November 5, 2009
Thursday, July 16, 2009
Star
everybody is a star hiding so many things in them, one who let it come out looks diff and we call it as star.
Pushpesh Pandey
July 17, 2009
Pushpesh Pandey
July 17, 2009
Monday, April 27, 2009
बस वो इंसान बदल गया है …………………..
खता क्या थी उस कैफ की
इज़हारे मुहब्बत ही तो किया था
दुनिया ने जो यूं मारे पत्थर
ऐसा क्या उसने गुनाह किया था
अजब दस्तूर है दुनिया का
लुटवा दी जिन तमाशबीनों ने अस्मतें
जाने कितनी जानें गयी जिंदगियां फ़ना हुईं
कितनो ने खोया बचपन जिनकी वजह से
आज वो ही इस वतन के सरपरस्त तलबगार बने हैं
चड बैठे हैं तानाशाह बन कर
आज हमारे मसलों में मददगार बने हैं
किससे शिकायत करे किससे दोस्ती चाहे
ये गलतियाँ भी हमारी तो नहीं
किसने बनाया खुदा फैसला करने को हमारी किस्मत का
किसने इन्हें ताजो तख्त से नवाजा
भूल गए हम वो होली का रंग वो ईद की सिवईयां
वो मुहर्रम का जुलुस
सब साथ शरीक होते थे मिल बाँट के मनाते थे
सुख हो या दुःख हर लम्हा साथ बिताते थे
फिर कुछ हिन्दू का धरम बटा
किसी मुस्लिम ने चाँद को हथिया लिया
ऊपर वाले ने तो कुछ नहीं कहा सुना
बाटने वाले ने माँ का कलेजा ही बाट लिया
बचपन में जिसे सब अम्मी कहते थे बड़े चाव से
आज वो एक मुस्लिम दुश्मन की माँ हो गयी
और जो माँ हर घर की शान थी
वो काफिर खातून के नाम से नवाजी गयी
वो जहा थे वही हैं उनका झगडा आज भी उस कुर्सी का है
भाई भाई जो साथ में खाते थे एक थाली में, बस वो इंसान बदल गया है
न तो उसका अल्लाह बदला न मेरा भगवान्, बस वो हिन्दू वो मुस्लमान बदल गया है
पुष्पेश पाण्डेय, अप्रैल 27
इज़हारे मुहब्बत ही तो किया था
दुनिया ने जो यूं मारे पत्थर
ऐसा क्या उसने गुनाह किया था
अजब दस्तूर है दुनिया का
लुटवा दी जिन तमाशबीनों ने अस्मतें
जाने कितनी जानें गयी जिंदगियां फ़ना हुईं
कितनो ने खोया बचपन जिनकी वजह से
आज वो ही इस वतन के सरपरस्त तलबगार बने हैं
चड बैठे हैं तानाशाह बन कर
आज हमारे मसलों में मददगार बने हैं
किससे शिकायत करे किससे दोस्ती चाहे
ये गलतियाँ भी हमारी तो नहीं
किसने बनाया खुदा फैसला करने को हमारी किस्मत का
किसने इन्हें ताजो तख्त से नवाजा
भूल गए हम वो होली का रंग वो ईद की सिवईयां
वो मुहर्रम का जुलुस
सब साथ शरीक होते थे मिल बाँट के मनाते थे
सुख हो या दुःख हर लम्हा साथ बिताते थे
फिर कुछ हिन्दू का धरम बटा
किसी मुस्लिम ने चाँद को हथिया लिया
ऊपर वाले ने तो कुछ नहीं कहा सुना
बाटने वाले ने माँ का कलेजा ही बाट लिया
बचपन में जिसे सब अम्मी कहते थे बड़े चाव से
आज वो एक मुस्लिम दुश्मन की माँ हो गयी
और जो माँ हर घर की शान थी
वो काफिर खातून के नाम से नवाजी गयी
वो जहा थे वही हैं उनका झगडा आज भी उस कुर्सी का है
भाई भाई जो साथ में खाते थे एक थाली में, बस वो इंसान बदल गया है
न तो उसका अल्लाह बदला न मेरा भगवान्, बस वो हिन्दू वो मुस्लमान बदल गया है
पुष्पेश पाण्डेय, अप्रैल 27
Saturday, March 28, 2009
ये ग़ज़ल क्या है ............
सुन रहा था ध्यान से ग़ज़ल बैठा, तो उसने पूछा
सुनते हो बड़े ध्यान से, ये ग़ज़ल क्या है
मैंने कहा,
अल्फाज़ हैं किसी शायर के लिखे
या तस्स्वुर है, ये मेरी जिंदगी का
एसी ही कुछ गज़लें मैंने अपनी यादों में सजायी हैं
सुनता हूँ तो लगता है, जैसे आइना देख रहा हूँ मैं
जिंदगी के कई पल उस शायर ने शब्दों में ढाल रखे हैं
जानता था वो क्या मेरे बारे में, कैसे इतना
या मेरी तरह वो भी गम का शौकीन था
या बना दिया था जिंदगी के हालात ने उसे
गमों का कुछ शौकीन यूँ मेरी तरह
अल्फाज नहीं हैं महज
दास्तान हैं इस जिंदगी की, उन ग़ज़लों में
वही गज़लें सजा के रखी हैं
वरना ग़ज़ल क्या है, अल्फाज़ हैं कुछ शायर के लिखे.....
पुष्पेश पाण्डेय, मार्च 29
सुनते हो बड़े ध्यान से, ये ग़ज़ल क्या है
मैंने कहा,
अल्फाज़ हैं किसी शायर के लिखे
या तस्स्वुर है, ये मेरी जिंदगी का
एसी ही कुछ गज़लें मैंने अपनी यादों में सजायी हैं
सुनता हूँ तो लगता है, जैसे आइना देख रहा हूँ मैं
जिंदगी के कई पल उस शायर ने शब्दों में ढाल रखे हैं
जानता था वो क्या मेरे बारे में, कैसे इतना
या मेरी तरह वो भी गम का शौकीन था
या बना दिया था जिंदगी के हालात ने उसे
गमों का कुछ शौकीन यूँ मेरी तरह
अल्फाज नहीं हैं महज
दास्तान हैं इस जिंदगी की, उन ग़ज़लों में
वही गज़लें सजा के रखी हैं
वरना ग़ज़ल क्या है, अल्फाज़ हैं कुछ शायर के लिखे.....
पुष्पेश पाण्डेय, मार्च 29
Saturday, February 7, 2009
जिंदगी क्या है..................
जिंदगी क्या है,
मसला है एक उलझा हुआ
या फिर कुछ उलझे रिश्तों के ताने बाने का
जो सुलझता भी है फिर उलझता, और फिर सुलझता सा दिखाई पड़ता है
जाने क्या सोचता हूँ
सुलझाने बैठता हूँ इसे जितना
उतना ही उलझ जाता हूँ
आज फिर जब इसे सुलझाने बैठा, फिर उतना ही उलझ गया
याद आती है बचपन की पतंग वाली वो चरखी
जिसमे डोर अक्सर उलझ जाया करती थी
सुलझाने की लाख कोशिश करता था उसको
पर वो कोशिश हर बार एक नयी कोशिश की वजह दे जाती थी
जिंदगी कहीं वही चरखी तो नहीं
या वो एक पहिया है साइकिल का
जो चलता रहता है, घूमता रहता
जब तक उसका सफ़र पूरा नहीं होता
और गर रुक गया तो फिर नए सफ़र की तलाश में निकल पड़ता है
समझ नहीं पाया हूँ कि जिंदगी क्या है
लगता है मसला एक उलझा हुआ...........
पुष्पेश पाण्डेय, फरवरी 8
मसला है एक उलझा हुआ
या फिर कुछ उलझे रिश्तों के ताने बाने का
जो सुलझता भी है फिर उलझता, और फिर सुलझता सा दिखाई पड़ता है
जाने क्या सोचता हूँ
सुलझाने बैठता हूँ इसे जितना
उतना ही उलझ जाता हूँ
आज फिर जब इसे सुलझाने बैठा, फिर उतना ही उलझ गया
याद आती है बचपन की पतंग वाली वो चरखी
जिसमे डोर अक्सर उलझ जाया करती थी
सुलझाने की लाख कोशिश करता था उसको
पर वो कोशिश हर बार एक नयी कोशिश की वजह दे जाती थी
जिंदगी कहीं वही चरखी तो नहीं
या वो एक पहिया है साइकिल का
जो चलता रहता है, घूमता रहता
जब तक उसका सफ़र पूरा नहीं होता
और गर रुक गया तो फिर नए सफ़र की तलाश में निकल पड़ता है
समझ नहीं पाया हूँ कि जिंदगी क्या है
लगता है मसला एक उलझा हुआ...........
पुष्पेश पाण्डेय, फरवरी 8
Saturday, November 1, 2008
ज़बान नहीं है कोई..........................
आज महफिल मैं तनहा खड़ा था
तो आईने में एक शायर मिला
देखा मुझको फिर पूछा
कि क्या तुम भी लिखते हो
मैंने कहा, लिखता तो नहीं
हाँ कुछ तस्वीरे आती हैं जहन में
उन्हें कागज पे उतार लेता हूँ
उसने पूछा, ज़बान क्या है तुम्हारी
मैंने कहा
तस्वीरे हैं कुछ बीते पल की
और ख़याल कुछ लम्हों के
वो ही कागज पे उतारे हैं
ज़बान नहीं है कोई
ज़बान में लोग मजहब ले आयेंगे
और फिर उसमे कई रिश्ते भी बुन्वायेंगे
जबान नहीं है कोई, कुछ लकीरे हैं आड़ी तिरछी
दिल की नज़र से देखो तो नज़र आएँगी
देश ज़बान या किसी सरहद की मोहताज नहीं
ख़याल है जहन का कागज़ पे उतरा हुआ
दिल लगाओगे तो तस्वीर बनती ही चली जायेगी
ज़बान नहीं है कोई..........................
पुष्पेश
नवम्बर ०२/२००८
तो आईने में एक शायर मिला
देखा मुझको फिर पूछा
कि क्या तुम भी लिखते हो
मैंने कहा, लिखता तो नहीं
हाँ कुछ तस्वीरे आती हैं जहन में
उन्हें कागज पे उतार लेता हूँ
उसने पूछा, ज़बान क्या है तुम्हारी
मैंने कहा
तस्वीरे हैं कुछ बीते पल की
और ख़याल कुछ लम्हों के
वो ही कागज पे उतारे हैं
ज़बान नहीं है कोई
ज़बान में लोग मजहब ले आयेंगे
और फिर उसमे कई रिश्ते भी बुन्वायेंगे
जबान नहीं है कोई, कुछ लकीरे हैं आड़ी तिरछी
दिल की नज़र से देखो तो नज़र आएँगी
देश ज़बान या किसी सरहद की मोहताज नहीं
ख़याल है जहन का कागज़ पे उतरा हुआ
दिल लगाओगे तो तस्वीर बनती ही चली जायेगी
ज़बान नहीं है कोई..........................
पुष्पेश
नवम्बर ०२/२००८
Monday, September 15, 2008
जब तुम नहीं होते हो
जब तुम नहीं होते हो, जाने क्यों तुम्हारी याद बहुत आती है
सामने तो कह नहीं पाता बस एक खामोशी सी घर कर जाती है
याद करता हूँ उन लम्हों को जो साथ बिताये हैं हमने
सुना था किसी शायर से की याद उन्हें करते हैं जिन्हें भुलाया हो कभी
तुम्हे भूला तो नहीं पर याद फिर भी बहुत आते हो
जाने क्यों सामने कुछ कह नहीं पाता
पर अकेले में बातें बहुत करता हूँ
तुम नहीं होते तो अक्सर तुम्हारी तस्वीर को ही देखा करता हूँ
तुम आते ही क्यों हो जाने के लिए
कभी न जाने के लिये भी आया करो
और अगर जाना ही होता है तुमको
तो जाने के बाद याद तो न आया करो
सोचा न था कि तुम यूं जिंदगी में आओगे
यादों ही नहीं दिल में भी घर कर जाओगे
तुम नहीं होते तो याद आती है वो तस्वीर जो बचपन में देखी थी
कि बीच सागर में एक कश्ती अकेले चले जाती है
जब तुम नहीं होते हो, जाने क्यों तुम्हारी याद बहुत आती है
पुष्पेश, सितम्बर, 15 2008
सामने तो कह नहीं पाता बस एक खामोशी सी घर कर जाती है
याद करता हूँ उन लम्हों को जो साथ बिताये हैं हमने
सुना था किसी शायर से की याद उन्हें करते हैं जिन्हें भुलाया हो कभी
तुम्हे भूला तो नहीं पर याद फिर भी बहुत आते हो
जाने क्यों सामने कुछ कह नहीं पाता
पर अकेले में बातें बहुत करता हूँ
तुम नहीं होते तो अक्सर तुम्हारी तस्वीर को ही देखा करता हूँ
तुम आते ही क्यों हो जाने के लिए
कभी न जाने के लिये भी आया करो
और अगर जाना ही होता है तुमको
तो जाने के बाद याद तो न आया करो
सोचा न था कि तुम यूं जिंदगी में आओगे
यादों ही नहीं दिल में भी घर कर जाओगे
तुम नहीं होते तो याद आती है वो तस्वीर जो बचपन में देखी थी
कि बीच सागर में एक कश्ती अकेले चले जाती है
जब तुम नहीं होते हो, जाने क्यों तुम्हारी याद बहुत आती है
पुष्पेश, सितम्बर, 15 2008
Friday, September 12, 2008
बचपन में सुनता था माँ से……
बचपन में सुनता था माँ से
कि चिड़िया के बच्चे बड़े हो कर उड़ जाते हैं
लौट के उस आशियाने में, वो वापस नहीं आते हैं
आज जब बड़ी बिल्डिंग कि छोटी बालकनी से देखता हूँ
कभी कभी वो छोटा घर बहुत याद आता है
चहचहाते तो नहीं हम भाई बहन लड़ते थे जिसमे
वो छोटा सा आशियाँ याद आता है
कभी शिकायत थी नजदीकियों से,
आज इन् लम्बी दूरीओं से डर लगता है
कभी होते थे इतना पास कि छोटा भाई तंग करता था
या फिर वो बड़ा जो सदा चिड़ाता, मुझसे सदा ही लड़ता था
एक बहन भी थी प्यारी सी, आज सब वो जाने कहा है,
वो लड़ना झगड़ना वो फिर यूँ हि मिलना वो प्यार वो बचपन
वो सब जाने कहा है
उड़ गए पंछी सब, अब उस मकान के
अब वहां कोई नहीं लड़ता है
जाते हैं वहाँ त्योहारों में मेहमान बन कर
पर वहाँ कोई नहीं रहता है
इस बार सुना है एक पड़ोसी से
कि शायद एक चिड़िया ने वहाँ एक नया घोसला बनाया है
मुझे लगा जैसे मेरा वो बचपन लौट आया है
बचपन में सुनता था माँ से……
पुष्पेश सितम्बर १३ २००८
कि चिड़िया के बच्चे बड़े हो कर उड़ जाते हैं
लौट के उस आशियाने में, वो वापस नहीं आते हैं
आज जब बड़ी बिल्डिंग कि छोटी बालकनी से देखता हूँ
कभी कभी वो छोटा घर बहुत याद आता है
चहचहाते तो नहीं हम भाई बहन लड़ते थे जिसमे
वो छोटा सा आशियाँ याद आता है
कभी शिकायत थी नजदीकियों से,
आज इन् लम्बी दूरीओं से डर लगता है
कभी होते थे इतना पास कि छोटा भाई तंग करता था
या फिर वो बड़ा जो सदा चिड़ाता, मुझसे सदा ही लड़ता था
एक बहन भी थी प्यारी सी, आज सब वो जाने कहा है,
वो लड़ना झगड़ना वो फिर यूँ हि मिलना वो प्यार वो बचपन
वो सब जाने कहा है
उड़ गए पंछी सब, अब उस मकान के
अब वहां कोई नहीं लड़ता है
जाते हैं वहाँ त्योहारों में मेहमान बन कर
पर वहाँ कोई नहीं रहता है
इस बार सुना है एक पड़ोसी से
कि शायद एक चिड़िया ने वहाँ एक नया घोसला बनाया है
मुझे लगा जैसे मेरा वो बचपन लौट आया है
बचपन में सुनता था माँ से……
पुष्पेश सितम्बर १३ २००८
Tuesday, September 2, 2008
yaad
याद क्या है
दिन हैं कुछ बीते हुए
और वो लम्हा जो बीत गया
कुछ हसीं पल थे, और कुछ गम के साये
सब यादों के पुलिंदे में समेट के रखे हैं
कुछ धुंदली याद भी है, मेरी जब मैं भी हँसता था
फिर तुम्हे भुलाने बैठा तो खुद को ही मैं भूल गया
आज जब पुलिंदा यादों का खोलता हूँ तो एक धुन्द्ली सी शकल याद आती है
वो खिलखिलाता बचपन, वो कॉलेज की शरारत और वो एक हँसी याद आती है
खो गयी जो आज के कहकहों में, वो बोलती खामोशी आज इन महफिलों में
भीड़ में भी खुद को तनहा पाता हूँ
हँसता भी हूँ और रोता भी, उन यादों को जब याद किये जाता हूँ
यादें ही हैं अब और उन यादों का पुलिन्दा है
था मैं जो इंसान कभी वो आज उन यादों का एक वाशिंदा है.
दिन हैं कुछ बीते हुए
और वो लम्हा जो बीत गया
कुछ हसीं पल थे, और कुछ गम के साये
सब यादों के पुलिंदे में समेट के रखे हैं
कुछ धुंदली याद भी है, मेरी जब मैं भी हँसता था
फिर तुम्हे भुलाने बैठा तो खुद को ही मैं भूल गया
आज जब पुलिंदा यादों का खोलता हूँ तो एक धुन्द्ली सी शकल याद आती है
वो खिलखिलाता बचपन, वो कॉलेज की शरारत और वो एक हँसी याद आती है
खो गयी जो आज के कहकहों में, वो बोलती खामोशी आज इन महफिलों में
भीड़ में भी खुद को तनहा पाता हूँ
हँसता भी हूँ और रोता भी, उन यादों को जब याद किये जाता हूँ
यादें ही हैं अब और उन यादों का पुलिन्दा है
था मैं जो इंसान कभी वो आज उन यादों का एक वाशिंदा है.
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