टूट गए हैं इस कदर की अब जोड़े कौन
वक्त के दरिया में इतना डूब लिए अब खाए नए थपोड़े कौन
यूं तो सामने ही थी मंजिल उठ के एक कदम ही बड़ाना था
पर थक चुके हैं अब इतना कि फिर से ये दौड़ दौड़े कौन
पुष्पेश पांडेय
6 मई 2024
टूट गए हैं इस कदर की अब जोड़े कौन
वक्त के दरिया में इतना डूब लिए अब खाए नए थपोड़े कौन
यूं तो सामने ही थी मंजिल उठ के एक कदम ही बड़ाना था
पर थक चुके हैं अब इतना कि फिर से ये दौड़ दौड़े कौन
पुष्पेश पांडेय
6 मई 2024
घर की लड़की बैखौफ घूमे ये कहाँ हम पुरुषों को भाता है
ऐसा भी क्या समाज कैसी सुरक्षा जहाँ न गुंडों का खौफ सताता है
वो अपराधी भी तो इंसान हैं क्या उन्हें जीने का अधिकार नहीं
नेताओं के लड़के हैं गलती हो जाती है उनसे उनपर करो तुम वार नहीं
क्या समझा है तुमने योगी वो क्या UP जिसमे त्राहिमाम हाहाकार नहीं
क्या हुआ जो तुमने अपराधों को कम किया
क्या हुआ जो बिजली पानी घर घर का संकल्प लिया
कितनो का रोजगार छीना जो भ्रष्टाचार कम किया
कितनो की दलाली छीनी जो लोगों तक फायदा तुम सीधे पहुंचाए
क्या किया जो तुमने कितने शौचालय बनवाये
क्या हुआ जो तुम राम लला को घर ले आये
अपने सगे भाई बहन को न फायदा तुमने पहुँचाया
क्या तुम किसी जाती विशेष का फायदा करोगे
ऐसी निरपेक्ष ईमानदार नीति से न तुम गुंडों की जेब भरोगे
दंगा मुक्त प्रदेश कर तुमने कितनो के धंदे बंद कराये
मजहब के नाम पे राजनीति करने वाले कितने जेल पहुंचाए
कितने बाहुबली जेल पहुंचाए जिनके नाम से उप्र थर्राता था
किसी किसी पार्टी मैं तो इन बाहुबलियों का मेला सा लग जाता था
जो आतंक का पर्याय बन अब तक अपनी दुकान चलाते थे
उनकी इंसानियत की न सोची तुम उनके घर बुलडोज़र चलवाते थे
जेल में डाला दंगाइयों को जिसने संपत्ति का नुक्सान किया
वो भी तो इंसान थे योगी जिन दंगाइयों से तुमने मुक्त किया
घर की इज्जत घर में भली घर से बहार ही क्यों जाना है
लड़को से तो गलती होती रहती है ऐसा माहौल बनाना है
सुशासन नहीं कुशासन और दंगाइयों को जिताना है
वो भी तो इंसान हैं उन अपराधी और दंगाइयों को जेल से छुड़वाना है
योग्यता के आधार पर नहीं भीख मांग के जीवन ये बिताना है
फिर उप्र मैं त्राहिमाम की आवाज को बढाना है
और ये सब चीखपुकार मारकाट हो सके इसलिए योगी को नहीं जिताना है
जरा खिड़की से हाथ निकालकर देखो
डिलीवर हुआ या नहीं
कुछ बूंद जो आ गिरें हथेली पर
उन्हें संभाल कर रख लेना संदेसा समझ
न बहा देना बारिश का पानी समझकर
अल्फ़ाज़ हैं कुछ कोरे कागज़ पे लिखे
अश्कों की स्याही के
जो संभाल के रखोगे तो तुमसे बात करेंगे
सर पे न रखना संभाल कर इन्हे
दिमाग में घुस दिन भर शोर मचाएंगे
महफ़िल में भी तनहा पा तुम्हे ये सतायेंगे
अलमारी में जो बंद करोगी तो पछताती रहोगी
ये आवाज दे दे रोते रहेंगे तुम हर बार मनाती रहोगी
इन्हे तुम उस दिल में जगह दे देना
वो जो तुमने पास जमा किया रखा है
मान जायेंगे मुस्कुरा फिर संदेसा भी सुनाएंगे
जो पूछोगे तो ताजा हाल समाचार भी बताएँगे
घर सा लगेगा इन्हे, वहां इन्हे अपना सा महसूस होगा
जरा खिड़की से हाथ निकालकर देखो तो
डिलीवर हुआ या नहीं
बादलों पर लिखकर एक संदेशा भेजा है तुम्हें
पुष्पेश पांडेय
7 जनवरी 2022
कमब्खत ये तो फिर भी एक और रात है गुजर जाएगी
सालों पहले जिस एक रात को तुमने कहा था
सुबह बात करने को या शाम में दिन भर क्या हुआ ये किस्से बताने को
वो सुबह अभी तक नहीं हुई वो शाम आने के इंतज़ार में है
वो रात अब भी खामोश खड़ी है उस सुबह के इंतज़ार में
रात जब और गहरा सी जाती है अँधेरा स्याह हो जाता है
तो वो किस्से वो लम्हे जो दुनिया से छुपा के रखे हैं
वो जो बिताये हैं तेरे संग उन तस्वीरों का एल्बम सा निकल आता है
वो कुछ वीडियो रील सी चलती है रात भर लम्हों की
पता नहीं जागता हूँ या सोते हुए सपना देखता हूँ
फिर जो कैसेट बदलना हुआ फिल्म बदलने को
उठ जाता हूँ कैलेंडर में एक नयी तारिख दर्ज हो जाती है
पर वो रात है कि गुजरती नहीं,वो नहीं गुजरी अब तक
खड़ी है वक़्त के उसी मुहाने पे उसी सुबह के इंतज़ार में
पुष्पेश पांडेय
21 दिसंबर 2021
आज बैठा महखाने में सबसे गुफ्तगू यार कर रहा था
बहुत हो चला वक़्त क्या भर गए नासूर सवाल यही बार बार कर रहा था
भरी मई जून की दोपहरी हो लू के थपेड़ों मैं ढली बात हो
दिन हो बरसात के या फिर पूस माह की सर्द रात हो
दर्द तो कुछ कम न हुआ रह रह के उठ ही पड़ता है
टीस उभर ही जाती है दर्द उफन ही पड़ता है
साक़ी आ जाम के कुछ मरहम लगता है
फिर एक उम्मीद एक ख्याल कुछ राह दिखाता है
फिर शाम आते आते महखाने मैं जा बैठता है
फिर हर आने जाने वाले शख्स से सवाल वही उभर के बार बार आता है
बहुत बरस बीते काफी वक़्त हो चला क्या भर गए नासूर पूछे जाता है
है इंतज़ार में शायद कि कोई तो आएगा
कोई हमख़याल जो पैमाना साथ लड़ायेगा
वादा है जिसके आने का उसी एक शख्स इंतज़ार में
वादा है जिसके आने का उसी एक शख्स इंतज़ार में
बैठ जाता है अक्सर शाम को महखाने में किसी बार में
हर आने जाने वाले से वही सवाल बार बार करता है
या यूँ कहो हर शख्स में वो इसी बहाने इबादते यार करता है
पुष्पेश पांडेय
30 नवंबर 2021
Lovely and beautiful as I always see
You are my sweetheart how this beautiful can anyone be
You are my heartbeat my love my soul
I don’t love any specific thing about you
but I love you as you whole
You tears your joy your laugh your smile
I am in love with you and will remain all this while
Till there is life there is sun moon and the star
I will love you forever more and more each day this is my promise mere yaar
My life is incomplete without you
The only thing that fills my void is you
😘😘
आज बारिश में भीगता रहा मैं भी खुदा भी
दोनों बहुत देर भीगे मुस्कुराते रहे बतियाते रहे
बारिश रुकते ही दोनों मुड़े, एक दुसरे को देखे बिना चल दिए
उन मुस्कुराती शक्लों को अब भी बारिश की दरकार थी
इस माहोल में इन मुस्कुराती आँखों को बारिश का बहाना भी जरूरी था
पुष्पेश पांडेय
27 जुलाई 2021
वक़्त की शाख पे कुछ लम्हे अटक गए हैं
सोचता हु कभी चढ़ के उन्हें तोड़ लूँ
फल बड़े रसीले मालूम पड़ते हैं
पर तोड़ के तो उनमे जान नहीं रहेगी
सो चढ़ जाता हूँ उस टहनी में
जिस लम्हे को जीना होता है
जी लेता हूँ उन यादगार पलों को
फिर जब तुम कहती हो देर हुई बहुत हुआ
तो उतर आता हूँ मन न होते हुए शाम को घर लौटते किसी बच्चे सा
पर कल फिर खेलने की चाह होती है कोई अफ़सोस नहीं
ये खेल खेला है खेलते रहे हैं नतीजा कुछ भी हो
है तो एक आस में बसी और एक विश्वास की तुम साथ हो सदा
वरना तो ये पेड़ कबका सूख जाता बाल भी तो अब स्याह नहीं रहे
एक वक़्त था जब तुम बूढ़ा एल जी कह के चिढ़ाया करती थीं
तब जितने सफ़ेद थे अब उतने काले बचे होंगे शायद
कभी बैठना साथ तुम्हे भी यादों की किसी उस शाख पे बिठाएंगे
नहीं नहीं घबराओ नहीं पेड़ पुराना सही पर तुम्हारा भार सह लेगा
वैसे भी तो तुम हम ही उसकी शाखों पे कूदा करते हैं
चढ़ जाता हूँ जब कोई लम्हा जीना होता है
वक़्त की शाख पे कुछ लम्हे अटक गए हैं
पुष्पेश पांडेय
12 मई 2021
वो जन्मदिन याद है तुमको जब एक प्याली से चाय को पिया था
बारी बारी एक एक घूंट हमने जीवन अमृत को बाँट लिया था
वो जो तुम्हारे होठों की शोखी उस प्याली में कैद हुई थी
उसको अगली घूंट में मैंने जैसे खुद में भर लिया था
वो उस जन्मदिन की छोटी सी मुलाक़ात
उन लम्हो में की अनकहे लफ्जों की जाने कितनी बात
ऐसे छोटे बड़े जाने कितनी मुलाकातों के उपहार मैंने संजों रखे हैं
जीता हूँ उन्हें अक्सर, लम्हे जो यादों की तिजोरी मैं महफूज़ रखे हैं
यूँ तो सदा ही दुनिया ने जाने कितनी बंदिशें लगायी हैं
पर क्या कभी राधा और श्याम में विरह भी हो पायी है
आज भी नंदीवन में शाम को मानो मेला सा लग जाता है
जब हो शाम तो आकर श्याम राधा संग रास रचाता है
न श्याम बिन राधा, न बिना राधा हो श्याम पूरा
मैं तुम हम अधूरे एक दूजे बिन जीवन बहुत अधूरा
है विश्वास एक होंगे प्रेम में और रहेंगे संग अनंत
प्रेम बंधन की डोर में जो बँधे, इस रिश्ते का नहीं कोई अंत
वर्षों बीते विरह की चक्की पे पिस के कई परीक्षाओं से मुखर
साथ रहेंगे अब हम मिलेंगे अब इसी राह पर शेष जीवन अग्रसर
पुष्पेश पांडेय
16 april 2021
सुबह से थोड़ा मुस्कुरा क्या दिए हम
शाम आते आते खुद को खुद की नजर लगा बैठे
चिराग़ राहों में बिछाये थे मिलने के इंतज़ार के
शाम को वही चिराग़ दामन हमारा जला बैठे
न हो मायूस के मौक़े और भी आएंगे इश्क़ में
ये जिंदगी है इसे हमे तड़पाने में भी मजा आता होगा
दर्द भी मायूस हो जाता होगा हमे देख के
जब दर्द में हमे तेरी तस्वीर पे मुस्कुराता पाता होगा
सोचता होगा किस मिटटी से बनाया इन दोनों को
न मिटने वाली मुहब्बत की वो मिट्टी कहाँ ढूंढ पाता होगा
सुबह से थोड़ा मुस्कुरा क्या दिए हम
शाम आते आते खुद को खुद की नजर लगा बैठे .....
पुष्पेश पांडेय
16 फरवरी 2021
एक आस जो है मन में बसी
और एक विश्वास है कि तुम साथ हो मेरे सदा
कई कई बार बेवजह हँसता रहता हूँ
बतियाता हूँ लड़ पड़ता हूँ
सोचता हूँ तुम्हें तो फिर मुस्कुराता हूँ
याद करता हूँ तो खो जाता हूँ
यूँ तो कोई नहीं रिश्ता तेरा मेरा
पर सब रिश्तों से बढ़कर है
जिए हैं जीते हैं जो कुछ एक पल
वो इस सारे जीवन से बढ़ कर है
मन पंख लगाए उड़ चलता है
कभी मिलने के विचार से हिरन सी कुचाल भरता है
तो कभी विरह की वेदना में पीर से नीर गढ़ता है
नहीं टूटती तो एक आस जो है मन में बसी
और एक विश्वास है कि तुम साथ हो मेरे सदा
पुष्पेश पांडेय
25 जनवरी 2021
कौन
कम्बखत कहता है कि
इश्क़ मुकम्मल नहीं होता
उस आशिक़ से पूछो
जो रोज़ इश्क़ की
पायदान पे चढ़ता है
रोज
गिरता है गिर के
उठता है ख्याल में
हमसफ़र के अपने
रोज
एक नया ख़्वाब का
आशियाँ बुन इश्क़ में
आगे बढ़ता है
रोज
रोज जो ग़म के
गर्त मैं गोते न
लगाए तो क्या ख़ाक
इश्क़ किया
रोज
रोज जो ग़म के
गर्त मैं गोते न
लगाए तो क्या ख़ाक
इश्क़ किया
इश्क़
तो सजदा है पीर
का प्रेम है मीरा का
या दीवानगी है खुसरो की
जब ये दुनिया वाले
उन्हें न समझ सके
तो आप यार किनसे
उम्मीद जगाये बैठे हैं
ये तो फन है
उन दिलवालों का जो रोज
टूटते जुड़ते सपनो में भी
ख्याल
बुना करते हैं, जीते
हैं लम्हे जो गुजरेंगे कभी,
सोते हैं तो महबूब
का दीदार कर
और फिर सुबह
उठकर उसी का अक्स
देख उसका दामन थाम लेते हैं
जमाना
उन्हें दीवाना कहता है और
उसी तरह उनके बदइंतज़ाम
करता है
फिर
चाहे सूर का दोहा
हो मीरा
का भजन या अमीर
खुसरो की दीवानगी
जनाब
आशिक़ी भी भला कभी
इस दुनिया को गवार गुज़री
है
चिनवा
दिए गए कई इमारतों
में तो कई दौलतों
की भेंट चढ़े
जो न निपटे उन्होंने
ख्वाब बुने वो ख्वाबों
की नगरी दौड़ चले
मेरा
इश्क़ तुम्हारे लिए बेशकीमती था
कीमत लग न सकी
उसकी
तो उसे सहेज के
दिल की तिजोरी में
बंद कर रख छोड़ा
है
किसी
कंजूस बनिए की तरह
अपनी वो दौलत सहेज
के रखता हूँ
जब भी गिनता हूँ
उसे कभी अकेले महफूज
तन्हाई में
हर बार बढ़ा हुआ
ही पता हूँ खुश
हो जाता हूँ ये
देख
के दौलत कम नहीं
हुई थोड़ी भी ,जब
करो हिसाब ये बेहिसाब बढ़ती
जाती है
रंग
चढ़ सका न दुनिया
का जिस रंग पे,
उस रंग से मैंने
तेरी मोहब्बत को भिगो दिया
है
सुना तो है
पर कौन कम्बखत कहता है कि
इश्क़ मुकम्मल नहीं होता
आ के देखो दुनिया
आशिक़ की, कि किस
ख़ूबसूरती से इसे मुकम्मल किया है
पुष्पेश पांडेय
23 दिसंबर 2020