Saturday, January 11, 2014

वो गली सूनी पड़ी है अब उस मकान में कोई नहीं रहता...................



वो गली सूनी पड़ी है अब उस मकान में कोई नहीं रहता
जाता हूँ यूँ ही वहाँ अक्सर, उस सूने से गलियारे में
मामू की चाट अब भी मिलती है, वहाँ लोग जमा होते हैं
सुनते हैं कि मामू का  वो फीका डोसा, लोगों को आज भी नमकीन लगता है
कुछ लोग अक्सर कहते हैं मुझसे कि जिस गली को मैं सूना कहता हूँ 
वहाँ अक्सर वही पुराना चहल पहल का मौहौल रहता है
जाने क्यूँ दिखता नहीं कोई वहाँ, कोई शोर सुनता नहीं मुझे 
गुजरता हूँ जब भी कभी उस गली से, उस पुराने मकान के सामने

अब कोई शख़स उस मकानकी मुडेर पे खड़ा इंतज़ार नहीं करता
उस एक मुस्कराहट से, रंग जो अक्सर वहाँ फैला करते थे
अब उस सन्नाटे स्याह अँधेरे में कुछ नहीं दिखता
छत पे अक्सर जो कहकहे हम्रारे उस गली में गूंजा करते थे
उन क़हक़हों की चहल पहल की जगह एक सन्नाटा सा पसरा है
उस मकानकी पुरानी दीवारों पे वक़्त की सीलन सी लग गयी है जैसे
या यूँ कहो कि इंतज़ार में वो मकान भी अक्सर रो दिया करता  है
वो गली सूनी पड़ी है अब उस मकान में कोई नहीं रहता......


पुष्पेश पाण्डेय 

Jan 11,  2014

Friday, December 20, 2013

फिर आखिर उसकी ख़ुशी का राज क्या था .............



वो फटे से स्वेटर के उनों में उलझा
मैला कुचेला सा गंदे कपड़ो में सिमटा
बैठा हुआ उस मेट्रो स्टेशन के नीचे
आने जाने वालों को देख तकता
एक जलती लकड़ी के पास बैठा मुस्कुराता
ठण्ड को जैसे ठेंगा दिखाता
फिर ज्यों ज्यों रात का सन्नाटा गहराता
उस जलती लकड़ी कि राख के साथ आग कि तपिश भी कम होती
इधर उधर से कागज के पुर्जो को चुनता
कही मिल जाता टूटी टहनी का टुकड़ा
जो कहीं उसकी फूंकों से वो जल जाता
वो इठलाता मुस्कुराता विजय गीत गाता
यूँ ही जलने भुझने कि पशोपेश में अपनी रातें बिताता
फिर सुबह किसी कार वाले से एक दो रूपये का सिक्का ले कर
एक चाय कि चुस्की से सुबह के घने कोहरे को मुह चिढ़ाता
को दर्द नहीं था उसकी आँखों में, न किस्मत से कोई शिकवा या गिला
कभी भी किसी मोड़ पे वो या उसके जैसा कोई दिख जाता
और यूँ ही फिर सोचने को मजबूर करता
कि किस बात का घमंड था उसको
क्या था जो इस ठिठुरती ठण्ड रात में भी
एक जीत थी उसकी आँखों में
कि आंखिर उसकी ख़ुशी का राज क्या था
और क्यों जिनके पास सब कुछ था वो खुश नहीं थे
फिर आखिर उसकी ख़ुशी का राज क्या था

पुष्पेश पाण्डेय
दिसंबर 21, 2013

Friday, November 15, 2013

तुमने सोचा कि तुम्हारी जीत ने मेरी चीख को दबा दिया


जनम लिया तो लोगो की  आँखों से दिल में उतारी  गयी
कहीं गुड़िया कहीं लक्ष्मी और कहीं बिटिया कह के पुकारी गयी
कुछ घर वो भी थे जिन्होंने मुझे मनहूस का नाम दिया
या मेरी माँ को वंश दे सकने का ताना सुना दिया

मैं तो घर की बेटी थी जहाँ जनम लिया या ब्याही गयी उसी घर को अपना लिया
मानव जीवन की प्रतिस्पर्धा  और बड़ी तो मैंने भी हमसफ़र को अपना हाथ सहारे के लिए बड़ा दिया
घर कि चौखट से बाहर  कदम रखा और गर्व से सर ऊँचा कर विदेशों मैं भी नारी शक्ति का परचम लहरा दिया

पर ये व्यवस्था उन पुरुष प्रधान पंचों  से सही गयी
और समाज के शिष्टाचार  बंधन तोड़ने के लिए मैं ही दोषी कही गयी
यदि रात बेटा घर आये तो माँ का सीना चौड़ा हो जाता है
सबसे कहती बीटा जी तोड़ मेहनत  कर कमाई घर लाता है
परन्तु यदि यही मेहनत लड़की करे तो ये कहाँ समाज को भाता है
आज भी स्त्री का चरित्र उसके कपड़ो की लम्बाई से आंका जाता है

इस पर भी मैं रुकी तो पौरुष अभिमान में मद तथाकथित पुरुषों ने मेरा चीर ही हरा दिया
उन नपुंसक पुरुषों ने सोचा कि बाहुबल कि जीत ने मेरी चीख को दबा दिया
पर मैं वापस आउंगी दोगुनी ताकत से
मिटाऊंगी तुम्हारा दुराभिमानी अस्तित्व इस संसार रुपी वृक्ष कि शाखों से

मैं प्रकृति हूँ, मैं ही सृजन तो संहार भी मैं ही हूँ
इस संपूर्ण सृष्टीधारा का आधार भी मैं ही हूँ
जान लो कि हर घर में मैं ही माँ, मैं ही पुत्री, पुत्रवधू, शिष्टाचार, व्यवहार मैं ही हूँ
मत समझो मुझे बेबस यह चीख यदि बदले तो चंडी का अवतार मैं ही हूँ
असुर वध की थी जो गर्जना उस चंडी के अट्टाहास  मैं छुपा हाहाकार मैं ही हूँ

यदि फिर भी सोचते रहे कि तुम्हरी जीत ने मेरी चीख को दबा दिया
ये हो कि सृजन नहीं संहार का लेना पड़े रूप और फिर किसी चंडी कालका ने दुराभिमानी अस्तित्व को ही संसार से मिटा दिया

पुष्पेश पाण्डेय 
नवंबर 16, 2013

Thursday, August 1, 2013

उन चंद बूँदों ने एक याद सी दिला दी


आज फिर बारिश के मौसम में जो हवा चली, उन चलती हवाओं और पेशानी  पे जा गिरी चंद बूँदों ने एक याद सी दिला दी
वो चंद बूँदें बारिश की जो पेशानी से होते हुए यूँ कंधों पे जा गिरी

जैसे तुम गले लग के हो रोये और आँसू का इक कतरा तुम्हारे गालों से धुलक्ता कांधों पे जा गिरा हो कोइ
चलती हवाओं का वो तेज बेबाक रुख जैसे आ के तेजी से बाहों में समा रहा हो कोई

यूँ ही खड़ा रहा भीगता,  आज घंटों  तन्हा वहीं उन  खयालो के गदर में
गिरता सम्भलता यूँ ही हाथ मलता, सोचता झुंझ्लाता पानी में कुछ पुरानी तस्वीरें सी बनाता
कभी उस बारिश में खड़ा  ठहठहाता, यूँ ही हँसता और कभी उन बूँदों में भीगी पलकें छुपाता

फिर एक जोर की हवा चली वो चँद बूँदें उड़ा के ले गयी, सूरज निकला किरणें फूटी और नया एक जीवन सा खिल गया
पर वो बरसता बादल का टुकड़ा आसमान में जैसे एक खाली कोई पैबन्द सा सी गया
मैं देखता रहा आसमान को तकते यूँ ही फिर शाम गुजरी और चाँद निकल आया

मैंने बादलों के उस टुकड़े को अलविदा कहाओर नजरें झुका कंकड़ों में ठोकरें मारता घरको लौट आया
बरसात का मौसम था, फिर बादल आए, फिर बरसात हुई और में तकता रहा यूँ ही पर वो बादल का टुकड़ा ना आया
फिर सोचा कि हाँ जिंदगी भी तो है यूँ ही, साथ जो छोड़ गया राह् में कोई वो फिर कहां लौट के आया

तुम भी तो ना आए थे , जो गए थे अलविदा कह कर साथ चलते हुए, यूँ फिर मिलने, साथ चलने का वादा देकर
मैं खड़ा रहा वही उस मोड़ पर, जाने कितनी बरसाते आयीं, जाने कितने बादल आए
काले घने मतवाले से, जो लरज-गरजके बरसे, चीखे, गर्जे ओर चोंधीयाये

सिर उठा के जो देखा ऊपर तो उस मुस्कुराते बादल ने चंद बूँदें बारिश की मेरी पेशानी  पे गिरा दीं  
आज फिर बारिश के मौसम में जो हवा चली, उन चलती हवाओं और पेशानि पे जा गिरी चंद बूँदों ने एक याद सी दिला दी

(पेशानी  = Forehead)


पुष्पेश पाण्डेय 
Aug 01, 2013

Sunday, March 24, 2013

यूँ ही टकरा गया आज उसी शायर से ........



फिर बैठे बैठे इत्तेफाक से यूँ ही टकरा गया आज उसी शायर से
जो किसी महखाने में शाम ढले मिल जाता हँसता मुस्कुराता, यूँ ही बैठा यारों में जाम टकराता

जाने क्यों गुम था वो भीड़ में  यूँ ही तनहा सा खड़ा एक जाम लिए
अक्सर कभी कुछ यूँ ही पगला दीवाना सा मालूम देता
मुस्कुराता और कभी ठहठहा कर हँसता फिर नम आंखों से चंद अश्क बहा करते

ठहठहा लगा के फिर कभी कोई बात दीवानी करता
या फिर किस्सा कोई पुराना छेड़  देता अपनी यादों के ताने बानों से
या जी जाता फिर कोई लम्हा यूँ ही सोच में डूबा पुरानी यादों के झरोखों से

साकी के दिए हर नए जाम के साथ ज्यों ज्यों नशा बड़ता जाता
बुनता जाता एक नया तानाबाना यादों का मिलकर ख्यालों से
जिया करतावो हर एक लम्हा भी जो हुआ ही नहीं, अपने ख्यालों की चित्रकारी से

फिर जब चड़ते आफ़ताब के संग नशा ये जिंदगी का सर से उतरता
रह जाता खामोश वीरान खड़ा भीड़  मैं यूँ ही तनहा
सवालों के जवाब ढूँढता, ख्वाबों और हकीकत से उलझता लड़ता बीती रात की खुमारी से

गुजार देता दिन  अपना इसी कशमकश में,ख्वाब, बीती याद और हकीकत ऐ जिंदगी की मशक्कत में
और फिर वो किसी महखाने में शाम ढले मिल जाता हँसता मुस्कुराता,   यूँ ही बैठा यारों में जाम टकराता


पुष्पेश पाण्डेय
March 25 2013




Saturday, September 15, 2012

पथ प्रदर्शक


याद है मुझको वो जब मैंने

ऊँगली पकड़ तुम्हारी था चलना सीखा

मैं लड़खड़ाता हँसता गाता

अपनी गलतियों पे मुस्काता

जब जब ज्यों ज्यों गिरने को होता

तुम उठाते हाथ बढ़ाते

मुझको थामे गले से लगाते

कभी भी मुझको गिरने देते

हाथ थाम तुम मुझे थाम लेते

हाथ पकड़ कर मुझे समझा कर

आगे चलने मुझको तुम कहते

वो जो ऊँगली पकड़ी थी मैंने

आज भी वो ही पकड़ी हुई है

जीवन की इस आपाधापी में

जब जब ज्यों ज्यों मैं गिरने को होता

तुम हो आते मुझे समझाते

जीवन पथ की राह दिखाते

आज भी जब जीवन राह की उलझन में मन ये मेरा उलझ सा जाता

नहीं सूझती राह कोई जो मन ही मन यूँ घबराता

आँख मूंद कर पीछे मुड़ता, तुम्हें खड़ा मुस्काता पाता

हाथ पकड़ मुझे चलाने का करते हो तुम प्रयास अथक

तुमको नमन हे मेरे पिता, शत शत नमन हे पथ प्रदर्शक

पुष्पेश पाण्डेय

16 Sept 2012

Monday, September 10, 2012

मेरा भारत महान

देश की आवाज़ उठाने वाले कार्टूनिस्ट पर देशद्रोह का इलज़ाम,
देश बेचने वाले नेताओं, मीडिया एवं उद्योगपतियों का हो रहा सम्मान,
शहीदों के कफ़न से लेकर कोयले की दलाली पर मूक बना सविंधान ,
इस देश को चलाने वाले नेताओं तुमको शत शत नमन क्योंकि ,
मेरा भारत महान, मेरा भारत महान

पुष्पेश पाण्डेय
Sept 10 2012

Sunday, October 9, 2011

मेरे देश की मिटटी की सोंधी खुश्बू

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सुबह सुबह बारिश की दस्तक से किवाड़ खोला
देखा कुछ बूदें ताजगी भरी बिजली के तारों पे सिमटी थी
फिर कहीं से एक बूँद आती उनमे जुडती
एक छोर से दूसरे छोर तक स्वतंत्र विचरती
और फिर एक टप की आवाज कर नीचे गिर जाती
जीवन की इस उठा पटक का जीवंत वर्णन कर जाती

खड़ा रहा कुछ देर यूँ ही उस बारिश में
जाने क्या ढुन्द्ता सूंघता गुनगुनाता खोजता
पर वो मिटटी की खुशबु नहीं मिल पाई

हाँ कुछ बड़ी इमारतों से गुजरते बादलों की घटा
कुछ गरजते बरसते बादलों की आवाज
और उन बड़ी बड़ी इमारतों के बीच से गुजरती उन हवाओं का शोर
सभी कुछ था बस एक वो मन जो भाग रहा था देश की ओर

वो मिटटी के घर वो बारिश वो खेत वो घटायें
उसमें नहाते वो छोटे बच्चे सारी दुनिया से दूर अपने ही जग को हाथ में समेटे
वो जो उनकी नाव नहीं जीत पाती थी या बारिश की कोई बड़ी बूँद उसे डूबा जाती थी
वो छोटी सी बारिश की लहर में पार होने का डर
वो भीग जाने पर घर में घुसते हुए माँ की डांट का डर
वो गरम चाय की चुस्की पकोड़ों की प्लेट और चटनी का साथ

वो ही मिटटी जिसे पांव में लग जाने पर मैं मन ही मन गुस्साता था
और उन टूटी सडको के पूरा न होने पर प्रशासन पर चिल्लाता था
वो काल्पनिक नदियाँ जो सिर्फ बारिश में प्रकट होती थी
और मेरी कार को शीशों तक रोज भिगोती थी
वो भगवान् का जाप जो मैं सच्चे ह्रदय से करता था
प्रभु आज घर पहुंचा दो बस मन यही जपा करता था

पर हर किसी बार उन व्यवस्थाओ के और अच्छा होने की आरज़ू होती थी
जो नहीं है यहाँ जिसे ढूंडा करता हूँ वो ये कि
मेरे देश की बारिश में मेरी मिटटी की सोंधी खुश्बू होती थी
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पुष्पेश पाण्डेय
अक्टूबर 9 2011 Houston

Saturday, August 6, 2011

काँच के प्यालों में अक्सर कुछ कुरेदा करता है

काँच के प्यालों में अक्सर कुछ कुरेदा करता है
लिखता था कभी, ऐसा लोग कहते अब तो गम ग़लत करता है
मैने देखा नहीं, मुझे मिला नही वो कभी
पाता था अक्सर उसे साथ बैठे, वहीं महखाने मैं
ह्म्प्याला बनता हसता मुस्कुराता, अक्सर खुशी से मुह चिड़ाता
यूँ दिखता नहीं मिलता भी नही, पर अक्सर जब प्याला भर जाता
कही छलक ना जाए, जाम गिर ना पड़े ये सोच ज्यों ही उसे होठों से लगता
जाम के अंदर जाते ही, वो फिर सामने आ जाता वैसा ही हसता मुस्कुराता
हम घनटों बैठे बतियाते, बीते 7 मिनटों में 7 जन्मों के किससे सुनाते
मैं सुनता नही, बातों बातों मैं अक्सर उसके हाथो पे नज़र गडाता
कही कुछ लिख ना दे, ना मैं भूल जाउ कहीं,, जहन में बस यही एक ख़याल आता
मैं भी बैठता रहता एकटक निगाह डाले उसे, हम रहते साथ मैं जब तक वो घर ना जाता
या फिर जब तक साकी ना सहारा दे मुझे उठाता या फिर वो कोचवांन घर छोड़ जाता
अगली शाम जब बाज़ार जाता तो फिर वही आवाज़ आती
कल जनाब तशरीफ़ लाए थे ओर कुछ नशीले नज़म सुनाए थे
खोजता रहता होश में, पर वो कम्बख़्त तो दो प्यालो के बाद ही आता
आज खाली प्याला ले के बैठा सूखा सा दीवाना बन, पर वो ना आया
कही प्याले मैं तो नही जा बैठा मेरा दोस्त, ये सोच प्याले मैं हाथ घुमाया
आवाज़ आई एक टूटने की जानी पहचानी सी, लगा यूँ की खुद से हाथ मिलाया है
जा पहुँचा हकीम के दर तो सुना की कोई नया मजमून आया है
आज गोया जनाब थे होश मैं तो खून से ही कुछ लिख फरमाया है
वरना लिखता तो नही काँच के प्यालों में अक्सर कुछ कुरेदा करता है

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पुष्पेश पांडेय Aug 6th 2011

Wednesday, May 11, 2011

जब रात के आगोश में सन्नाटा अक्सर सो जाता है

जब रात के आगोश में सन्नाटा अक्सर सो जाता है

उठती है कसक सी एक आहट की, जैसे तुम आये हो

वो रेशमी चांदनी बिखेरे यादें तब घर कर जाती हैं

बंद आँखों से जागते हुए ख्वाब में अक्सर मुस्कुराता हूँ

वो खोया वक़्त जो पीछे कहीं छूट गया

फिर उस रात की चांदनी में लिपटा चारों ओर बिखर जाता है

यूँ ही ख्वाब में जागते हुए अक्सर रात गुजर जाती है

और फिर एक नयी सुबह फिर मिलने का वादा दे चली आती है

उठकर बैठता हूँ सोचता हूँ अक्सर आँख मलता कि ख्वाब है क्या ये

या ख्वाब था वो, जो मैंने देखा था तब

जब रात के आगोश में सन्नाटा अक्सर सो जाता है



पुष्पेश May 12, 2011

Sunday, December 19, 2010

सोच रहा हूँ मैं उसे नाम क्या दूँ

वो जब दरवाजे पे तुमने एक रोज दस्तक दी थी
यूँ लगा जिंदगी मिल गयी है
ख्वाबं हो गए हैं पूरे
एक नयी रौशनी सी मिल गयी है

फिर एक वो दिन भी आया, जब तुम कुछ यूँ रूठ के गए
नाराज हो हमसे यूँ मुड़े, कि पलट के देखा भी नहीं
आवाज को एक तुम्हारी तकता रहा मैं
पर तुम जो गए एक बार कि फिर न आये

फिर अरसे बाद एक आवाज जो तुमने दी
तो लगा पूस की अमावस रात में
चाँद सा एक निकल आया हो जैसे

जिंदगी थी फिर वही
थी खुशियाँ और वही सपने
हाथ थामे मेरा तुम जो साथ बैठे थे

उसी ख़ुशी के बीच में
किलकारी की एक आवाज सी आई
यूँ लगा जिंदगी मिल गयी है
ख्वाबं हो गए हैं पूरे
एक नयी रौशनी सी मिल गयी है

नाम नहीं दिया इस किलकारी को अभी, सोचा भी नहीं
धुन्दता हूँ, सोचता और फिर पेशानी (forehead ) पे लकीरें जोड़ता
कि जो रिश्ता बन गया है दिल का, उसे आवाज क्या दूँ
सोच रहा हूँ मैं उसे नाम क्या दूँ
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Pushpesh 19 Dec 2010

Saturday, September 25, 2010

जिससे कुछ अच्छा लिख सकूँ....

गंगा यमुना का जलस्तर क्यूँ बड़ा या फिर
बड़ते प्रदुषण से नाला बनी नदी को स्वयं ही रोद्र रूप धरना पड़ा

अयोध्या में राम लला जीत जायेंगे या अल्लाह जशन मनाएंगे
कुछ कुर्सी पे बैठ के बाकि विपक्ष में नारे लगायेंगे

नेता हिन्दू हो या मुस्लिम किसी को न देश से सारोकार है
वोट की राजनीति है और चल रहा नोट का कारोबार है

आधे भारत में नदियाँ उफान पे हैं, जनता त्राहि त्राहि कर रही उसका हाल बेहाल है
पर कॉमन वेल्थ के नाम पर, इन्हें तो नोट कमाने और होना मालामाल है

न तो इन्हें आपदा ही दिखती है, न सुनती है जनता की चीख पुकार
राम रहीम हो या CWG, देश और जनमानस का करते आ रहे यह व्यापार

आज जो सत्ता में नहीं कल वह बंधू सत्ता में आयेंगे
देश की खुदी हुई जड़ो को और मजबूती से हिलाएंगे

फिर दुसरे विपक्ष वाले बेरोजगारी, शिक्षा और आम जन की व्यथा के गाने सुनायेंगे
आयेंगे भाषण देंगे और जनमानस को भड़का के अपने वाहनों में शांतिपूर्वक लौट जायेंगे

इस देश का सोया जनमत फिर भी न जागेगा
चुनाव का पहिया फिर किसी हिन्दू या मुस्लिम जातिवाद की तरफ भागेगा

सोचता हूँ इन बड़ी नदियों की लहरों से हो मंथन, और इस भ्रष्टाचार को उसमे किसी प्रकार मथ सकूँ
की शायद ख़तम हो ये आजीवन वनवास और वापस लौट आयें राम जिससे कुछ अच्छा लिख सकूँ

पुष्पेश
25 Sept 2010

Saturday, June 26, 2010

किसान कि अभिलाषा

आसमान की ओर तकते उस किसान का चेहरा उदास है
कभी हरी भरी इस धरती को फिर से कुछ बूंदों की आस है

लगी हैं आसमान में आँखे कि कब ये बादल गरजेंगे
फिर लहलहायेंगी वो फसलें झूम के घटा सावन बरसेंगे

वो मां देखती हैं आसमान में कि कब वो बारिश होगी
कब उसके बच्चो की थाली में चावल और डाली होगी

रुके हुए हैं झूले सावन के पर यौवन कहा रुकता है
उस किसान बाप के चहेरे पे लड़की की उम्र का दर्द छलकता दिखता है

तांडव है ये प्रकृति का या इस मानव जाती को कोई अभिशाप है
इस अभिशाप के रावण का नाश कर जो प्रकृति को प्रसन्न करे मुझे उस राम की तलाश है

यदि इस पर भी वृक्षों को काटता वनों को उजाड़ता मानव रूपी रावण सोता रह जायेगा
डरता हूँ क्या हमारे बीच में वो राम कभी आ पायेगा
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पुष्पेश
26 June 2010