वो गली सूनी पड़ी है अब उस मकान में कोई नहीं रहता
पुष्पेश पाण्डेय
Jan 11, 2014
याद है मुझको वो जब मैंने
ऊँगली पकड़ तुम्हारी था चलना सीखा
मैं लड़खड़ाता हँसता गाता
अपनी गलतियों पे मुस्काता
जब जब ज्यों ज्यों गिरने को होता
तुम आ उठाते हाथ बढ़ाते
मुझको थामे गले से लगाते
कभी भी मुझको गिरने न देते
हाथ थाम तुम मुझे थाम लेते
हाथ पकड़ कर मुझे समझा कर
आगे चलने मुझको तुम कहते
वो जो ऊँगली पकड़ी थी मैंने
आज भी वो ही पकड़ी हुई है
जीवन की इस आपाधापी में
जब जब ज्यों ज्यों मैं गिरने को होता
तुम हो आते मुझे समझाते
जीवन पथ की राह दिखाते
आज भी जब जीवन राह की उलझन में मन ये मेरा उलझ सा जाता
नहीं सूझती राह कोई जो मन ही मन यूँ घबराता
आँख मूंद कर पीछे मुड़ता, तुम्हें खड़ा मुस्काता पाता
हाथ पकड़ मुझे चलाने का करते हो तुम प्रयास अथक
तुमको नमन हे मेरे पिता, शत शत नमन हे पथ प्रदर्शक
पुष्पेश पाण्डेय
16 Sept 2012