जब रात के आगोश में सन्नाटा अक्सर सो जाता है
उठती है कसक सी एक आहट की, जैसे तुम आये हो
वो रेशमी चांदनी बिखेरे यादें तब घर कर जाती हैं
बंद आँखों से जागते हुए ख्वाब में अक्सर मुस्कुराता हूँ
वो खोया वक़्त जो पीछे कहीं छूट गया
फिर उस रात की चांदनी में लिपटा चारों ओर बिखर जाता है
यूँ ही ख्वाब में जागते हुए अक्सर रात गुजर जाती है
और फिर एक नयी सुबह फिर मिलने का वादा दे चली आती है
उठकर बैठता हूँ सोचता हूँ अक्सर आँख मलता कि ख्वाब है क्या ये
या ख्वाब था वो, जो मैंने देखा था तब
जब रात के आगोश में सन्नाटा अक्सर सो जाता है
पुष्पेश May 12, 2011
Wednesday, May 11, 2011
Sunday, December 19, 2010
सोच रहा हूँ मैं उसे नाम क्या दूँ
वो जब दरवाजे पे तुमने एक रोज दस्तक दी थी
यूँ लगा जिंदगी मिल गयी है
ख्वाबं हो गए हैं पूरे
एक नयी रौशनी सी मिल गयी है
फिर एक वो दिन भी आया, जब तुम कुछ यूँ रूठ के गए
नाराज हो हमसे यूँ मुड़े, कि पलट के देखा भी नहीं
आवाज को एक तुम्हारी तकता रहा मैं
पर तुम जो गए एक बार कि फिर न आये
फिर अरसे बाद एक आवाज जो तुमने दी
तो लगा पूस की अमावस रात में
चाँद सा एक निकल आया हो जैसे
जिंदगी थी फिर वही
थी खुशियाँ और वही सपने
हाथ थामे मेरा तुम जो साथ बैठे थे
उसी ख़ुशी के बीच में
किलकारी की एक आवाज सी आई
यूँ लगा जिंदगी मिल गयी है
ख्वाबं हो गए हैं पूरे
एक नयी रौशनी सी मिल गयी है
नाम नहीं दिया इस किलकारी को अभी, सोचा भी नहीं
धुन्दता हूँ, सोचता और फिर पेशानी (forehead ) पे लकीरें जोड़ता
कि जो रिश्ता बन गया है दिल का, उसे आवाज क्या दूँ
सोच रहा हूँ मैं उसे नाम क्या दूँ
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Pushpesh 19 Dec 2010
यूँ लगा जिंदगी मिल गयी है
ख्वाबं हो गए हैं पूरे
एक नयी रौशनी सी मिल गयी है
फिर एक वो दिन भी आया, जब तुम कुछ यूँ रूठ के गए
नाराज हो हमसे यूँ मुड़े, कि पलट के देखा भी नहीं
आवाज को एक तुम्हारी तकता रहा मैं
पर तुम जो गए एक बार कि फिर न आये
फिर अरसे बाद एक आवाज जो तुमने दी
तो लगा पूस की अमावस रात में
चाँद सा एक निकल आया हो जैसे
जिंदगी थी फिर वही
थी खुशियाँ और वही सपने
हाथ थामे मेरा तुम जो साथ बैठे थे
उसी ख़ुशी के बीच में
किलकारी की एक आवाज सी आई
यूँ लगा जिंदगी मिल गयी है
ख्वाबं हो गए हैं पूरे
एक नयी रौशनी सी मिल गयी है
नाम नहीं दिया इस किलकारी को अभी, सोचा भी नहीं
धुन्दता हूँ, सोचता और फिर पेशानी (forehead ) पे लकीरें जोड़ता
कि जो रिश्ता बन गया है दिल का, उसे आवाज क्या दूँ
सोच रहा हूँ मैं उसे नाम क्या दूँ
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Pushpesh 19 Dec 2010
Saturday, September 25, 2010
जिससे कुछ अच्छा लिख सकूँ....
गंगा यमुना का जलस्तर क्यूँ बड़ा या फिर
बड़ते प्रदुषण से नाला बनी नदी को स्वयं ही रोद्र रूप धरना पड़ा
अयोध्या में राम लला जीत जायेंगे या अल्लाह जशन मनाएंगे
कुछ कुर्सी पे बैठ के बाकि विपक्ष में नारे लगायेंगे
नेता हिन्दू हो या मुस्लिम किसी को न देश से सारोकार है
वोट की राजनीति है और चल रहा नोट का कारोबार है
आधे भारत में नदियाँ उफान पे हैं, जनता त्राहि त्राहि कर रही उसका हाल बेहाल है
पर कॉमन वेल्थ के नाम पर, इन्हें तो नोट कमाने और होना मालामाल है
न तो इन्हें आपदा ही दिखती है, न सुनती है जनता की चीख पुकार
राम रहीम हो या CWG, देश और जनमानस का करते आ रहे यह व्यापार
आज जो सत्ता में नहीं कल वह बंधू सत्ता में आयेंगे
देश की खुदी हुई जड़ो को और मजबूती से हिलाएंगे
फिर दुसरे विपक्ष वाले बेरोजगारी, शिक्षा और आम जन की व्यथा के गाने सुनायेंगे
आयेंगे भाषण देंगे और जनमानस को भड़का के अपने वाहनों में शांतिपूर्वक लौट जायेंगे
इस देश का सोया जनमत फिर भी न जागेगा
चुनाव का पहिया फिर किसी हिन्दू या मुस्लिम जातिवाद की तरफ भागेगा
सोचता हूँ इन बड़ी नदियों की लहरों से हो मंथन, और इस भ्रष्टाचार को उसमे किसी प्रकार मथ सकूँ
की शायद ख़तम हो ये आजीवन वनवास और वापस लौट आयें राम जिससे कुछ अच्छा लिख सकूँ
पुष्पेश
25 Sept 2010
बड़ते प्रदुषण से नाला बनी नदी को स्वयं ही रोद्र रूप धरना पड़ा
अयोध्या में राम लला जीत जायेंगे या अल्लाह जशन मनाएंगे
कुछ कुर्सी पे बैठ के बाकि विपक्ष में नारे लगायेंगे
नेता हिन्दू हो या मुस्लिम किसी को न देश से सारोकार है
वोट की राजनीति है और चल रहा नोट का कारोबार है
आधे भारत में नदियाँ उफान पे हैं, जनता त्राहि त्राहि कर रही उसका हाल बेहाल है
पर कॉमन वेल्थ के नाम पर, इन्हें तो नोट कमाने और होना मालामाल है
न तो इन्हें आपदा ही दिखती है, न सुनती है जनता की चीख पुकार
राम रहीम हो या CWG, देश और जनमानस का करते आ रहे यह व्यापार
आज जो सत्ता में नहीं कल वह बंधू सत्ता में आयेंगे
देश की खुदी हुई जड़ो को और मजबूती से हिलाएंगे
फिर दुसरे विपक्ष वाले बेरोजगारी, शिक्षा और आम जन की व्यथा के गाने सुनायेंगे
आयेंगे भाषण देंगे और जनमानस को भड़का के अपने वाहनों में शांतिपूर्वक लौट जायेंगे
इस देश का सोया जनमत फिर भी न जागेगा
चुनाव का पहिया फिर किसी हिन्दू या मुस्लिम जातिवाद की तरफ भागेगा
सोचता हूँ इन बड़ी नदियों की लहरों से हो मंथन, और इस भ्रष्टाचार को उसमे किसी प्रकार मथ सकूँ
की शायद ख़तम हो ये आजीवन वनवास और वापस लौट आयें राम जिससे कुछ अच्छा लिख सकूँ
पुष्पेश
25 Sept 2010
Saturday, June 26, 2010
किसान कि अभिलाषा
आसमान की ओर तकते उस किसान का चेहरा उदास है
कभी हरी भरी इस धरती को फिर से कुछ बूंदों की आस है
लगी हैं आसमान में आँखे कि कब ये बादल गरजेंगे
फिर लहलहायेंगी वो फसलें झूम के घटा सावन बरसेंगे
वो मां देखती हैं आसमान में कि कब वो बारिश होगी
कब उसके बच्चो की थाली में चावल और डाली होगी
रुके हुए हैं झूले सावन के पर यौवन कहा रुकता है
उस किसान बाप के चहेरे पे लड़की की उम्र का दर्द छलकता दिखता है
तांडव है ये प्रकृति का या इस मानव जाती को कोई अभिशाप है
इस अभिशाप के रावण का नाश कर जो प्रकृति को प्रसन्न करे मुझे उस राम की तलाश है
यदि इस पर भी वृक्षों को काटता वनों को उजाड़ता मानव रूपी रावण सोता रह जायेगा
डरता हूँ क्या हमारे बीच में वो राम कभी आ पायेगा
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पुष्पेश
26 June 2010
कभी हरी भरी इस धरती को फिर से कुछ बूंदों की आस है
लगी हैं आसमान में आँखे कि कब ये बादल गरजेंगे
फिर लहलहायेंगी वो फसलें झूम के घटा सावन बरसेंगे
वो मां देखती हैं आसमान में कि कब वो बारिश होगी
कब उसके बच्चो की थाली में चावल और डाली होगी
रुके हुए हैं झूले सावन के पर यौवन कहा रुकता है
उस किसान बाप के चहेरे पे लड़की की उम्र का दर्द छलकता दिखता है
तांडव है ये प्रकृति का या इस मानव जाती को कोई अभिशाप है
इस अभिशाप के रावण का नाश कर जो प्रकृति को प्रसन्न करे मुझे उस राम की तलाश है
यदि इस पर भी वृक्षों को काटता वनों को उजाड़ता मानव रूपी रावण सोता रह जायेगा
डरता हूँ क्या हमारे बीच में वो राम कभी आ पायेगा
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पुष्पेश
26 June 2010
Monday, May 31, 2010
Sand and Stone
जीवन भी अजब एक पहेली है
कभी गम में रुलाती कभी खुशियों में हसाती
अजब रूप नित नया दिखाती
चंचल शोख मतवाली ये सहेली है
गम के सभी धागों को बुनता रहा मैं
फिर एक दोपहर उस गम के ताने बाने को
रेत के ढेर पे लिखने बैठा और वक़्त यूँ ही बीतता रहा
मौसम खुशगवार था हवा कुछ मंद सी बहती थी
शाम की ओस मेरे होटों पे आकर दस्तक सी कुछ देती थी
याद आया गम तो देखा
बहती हवा के साथ मायूसी की उस दास्तान को
वो रेत की चादर नील चुकी थी
अब वहां ख़ामोशी थी, था मैं
और मायूसी से भरे मेरे मन मैं था एक अहसास
की जो भी वक़्त था अच्छा बुरा वो बीत गया
यूँ ही सोचते हुए कुछ वक़्त और गुजरा
आते सूरज की कुछ किरने दस्तक दिल पे देती थी
एक नए सवेरे की राहत बची हुई मायूसी को मिटाती थी
और जीवन चक्र नयी आशा के साथ एक नयी सुबह की और
फिर उसी तरह हसता मुस्कुराता घूमता जाता था
कैद करता हूँ उन खुशगवार लम्हों को
पत्थरे संगमरमर में
जो कभी याद आता है वो सूनी रेत का ढेर
खुद को उन पथ्थरो पे बैठा पता हूँ
और दूर रेत के ढेर की बदलती सलवटों को देख मुस्कुराता हूँ
कभी गम में रुलाती कभी खुशियों में हसाती
अजब रूप नित नया दिखाती
चंचल शोख मतवाली ये सहेली है
गम के सभी धागों को बुनता रहा मैं
फिर एक दोपहर उस गम के ताने बाने को
रेत के ढेर पे लिखने बैठा और वक़्त यूँ ही बीतता रहा
मौसम खुशगवार था हवा कुछ मंद सी बहती थी
शाम की ओस मेरे होटों पे आकर दस्तक सी कुछ देती थी
याद आया गम तो देखा
बहती हवा के साथ मायूसी की उस दास्तान को
वो रेत की चादर नील चुकी थी
अब वहां ख़ामोशी थी, था मैं
और मायूसी से भरे मेरे मन मैं था एक अहसास
की जो भी वक़्त था अच्छा बुरा वो बीत गया
यूँ ही सोचते हुए कुछ वक़्त और गुजरा
आते सूरज की कुछ किरने दस्तक दिल पे देती थी
एक नए सवेरे की राहत बची हुई मायूसी को मिटाती थी
और जीवन चक्र नयी आशा के साथ एक नयी सुबह की और
फिर उसी तरह हसता मुस्कुराता घूमता जाता था
कैद करता हूँ उन खुशगवार लम्हों को
पत्थरे संगमरमर में
जो कभी याद आता है वो सूनी रेत का ढेर
खुद को उन पथ्थरो पे बैठा पता हूँ
और दूर रेत के ढेर की बदलती सलवटों को देख मुस्कुराता हूँ
Sunday, January 31, 2010
जो कह रहा हूँ आज कविता वो मेरी नहीं
जो कह रहा हूँ आज, कविता वो मेरी नहीं, यूँ तो कभी भी नहीं होती
सिर्फ कुछ तार होते हैं यादों के उलझे से
खाली वक़्त में उन्हें ही सुलझा लेता हूँ
आज फिर एक तार ले कर बैठा, और फिर तुम सामने आ गए हो
बदला नहीं है कुछ जब सामने तुम्हे देखता हूँ
आज भी वैसे ही तो दिखते हो जैसे उन दिनों दिखा करते थे
या शायद मैं ही बूड़ा हो चला हूँ
लाख याद करता हूँ पर तुम्हारा बुडापा याद ही नहीं आता
उसी उलझी तार को पकडे बैठा हूँ, समझ नहीं आता कहाँ से शुरुआत करूँ
वक़्त कुछ रुक सा जाता है, जब कभी इन तारों को हाथ में लेता हूँ
फिर कुछ समय बाद जब वो और उलझ जाते हैं
उठा कर सम्भाल रख देता हूँ, उन्हें बंद करके अलमारी में
आज जब उसे रखने गया तो देखा, वहां तारों के कई गुच्छे पड़े हैं
एक तार में शख्स इक कोई, खड़ा मुस्कुरा रहा था
मुझे लगा ऐसे मुस्कुराते शायद ये तुम ही हो
जाने क्या सोच के तार ली हाथ में वो, और फिर सुलझाने उसे बैठ गया
इस बार वो कुछ और नहीं उलझी हाँ वो चेहरा वो कहानी कुछ पहचानी सी लगी
करीब से देखा तो ये तुम नहीं हो, ये है वो परछाई मेरे बीते दिनों की
जो हस्ती थी मुस्कुराती थी लोगों की खुशियों में उनके संग गुनगुनाती थी
अब देखता हूँ खुद को उस तार में यूँ तो पहचान नहीं पाता हूँ
क्या क्यों और कैसे इन्हीं सवालों में उलझ जाता हूँ
बड़ा खुश था ये सोच के की आज कुछ सुलझ गया
हाथ में देखा तो उस बंद अलमारी के लिए कुछ नए सवालों का इक गुच्छा उलझ गया
जीवन के बदलाव और हर आम आदमी का किस्सा है
वही कागज पे उतार रहा हूँ ये नहीं मेरा हिस्सा है
जो कह रहा हूँ आज कविता, वो मेरी नहीं
सिर्फ कुछ तार होते हैं यादों के उलझे से
खाली वक़्त में उन्हें ही सुलझा लेता हूँ
आज फिर एक तार ले कर बैठा, और फिर तुम सामने आ गए हो
बदला नहीं है कुछ जब सामने तुम्हे देखता हूँ
आज भी वैसे ही तो दिखते हो जैसे उन दिनों दिखा करते थे
या शायद मैं ही बूड़ा हो चला हूँ
लाख याद करता हूँ पर तुम्हारा बुडापा याद ही नहीं आता
उसी उलझी तार को पकडे बैठा हूँ, समझ नहीं आता कहाँ से शुरुआत करूँ
वक़्त कुछ रुक सा जाता है, जब कभी इन तारों को हाथ में लेता हूँ
फिर कुछ समय बाद जब वो और उलझ जाते हैं
उठा कर सम्भाल रख देता हूँ, उन्हें बंद करके अलमारी में
आज जब उसे रखने गया तो देखा, वहां तारों के कई गुच्छे पड़े हैं
एक तार में शख्स इक कोई, खड़ा मुस्कुरा रहा था
मुझे लगा ऐसे मुस्कुराते शायद ये तुम ही हो
जाने क्या सोच के तार ली हाथ में वो, और फिर सुलझाने उसे बैठ गया
इस बार वो कुछ और नहीं उलझी हाँ वो चेहरा वो कहानी कुछ पहचानी सी लगी
करीब से देखा तो ये तुम नहीं हो, ये है वो परछाई मेरे बीते दिनों की
जो हस्ती थी मुस्कुराती थी लोगों की खुशियों में उनके संग गुनगुनाती थी
अब देखता हूँ खुद को उस तार में यूँ तो पहचान नहीं पाता हूँ
क्या क्यों और कैसे इन्हीं सवालों में उलझ जाता हूँ
बड़ा खुश था ये सोच के की आज कुछ सुलझ गया
हाथ में देखा तो उस बंद अलमारी के लिए कुछ नए सवालों का इक गुच्छा उलझ गया
जीवन के बदलाव और हर आम आदमी का किस्सा है
वही कागज पे उतार रहा हूँ ये नहीं मेरा हिस्सा है
जो कह रहा हूँ आज कविता, वो मेरी नहीं
Tuesday, January 26, 2010
माँ
जन्म लेते ही पहला शब्द यही बोला था
सुख हो या दुःख उसके ही पालने में झूला था
मैं हमेशा ही कुछ न कुछ मांगता रहता
वो हस्ती और जो भी मांगता मुस्कुरा के हाथ में ला देती
कभी सोचता कि जो मांगे वो मिले ऐसी भी क्या माँ के पास जादू की छड़ी है
लाख ढूँढता पर समझ न आता की माँ की किस अलमारी क कोने मैं पड़ी है
रात हो या दिन माँ को सोते नहीं देखता
सोचता था कि हम माँ के बच्चे ही सोते हैं
माँ लोग तो सिर्फ़ प्यार करने के लिये होते हैं
कभी रात को नीद खुलती भी तो, हमेशा मुझे ठण्ड से बचाती दिखती
चादर, रजाई या कभी कम्बल उड़ाती दिखती
कभी उसे खुद के लिये कुछ मांगते या कुछ खुद के लिये करते नहीं देखता
फिर भी वो हमेशा हँसती हमेशा मुस्कुराती रहती
धूप हो या छाँव हमें अपने गले से लगाती दिखती
हमारी ख़ुशी मैं खुश हो जाती हमें चोट लगे तो वो आंसूँ बहाती दिखती
हम शायद बड़े हो गए काफी बदल गए पर वो आज भी न बदली है
जाने किस मिट्टी की बनी है वो, जहां के लोग सारे लगते उसे अपने ही बच्चे हैं
चाहे कितनी बुराई हो हममे पर हम आज भी लगते उसे अच्छे हैं
हिन्दू रोये या मुस्लिम उसकी आँख आज भी छलक आती है
कोई भी बच्चा हँसता है वो उसके साथ आज भी मुस्कुराती है
जादू की छड़ी तो नहीं, पर शायद जिस मिट्टी से वो बनी उसमें ही एक करिश्माई है
आज भी चोट लगने पर जो पहला शब्द निकलता है, उस माँ शब्द में ही सारी सृष्टि समाई है
पुष्पेश, 26 जनवरी 2010
सुख हो या दुःख उसके ही पालने में झूला था
मैं हमेशा ही कुछ न कुछ मांगता रहता
वो हस्ती और जो भी मांगता मुस्कुरा के हाथ में ला देती
कभी सोचता कि जो मांगे वो मिले ऐसी भी क्या माँ के पास जादू की छड़ी है
लाख ढूँढता पर समझ न आता की माँ की किस अलमारी क कोने मैं पड़ी है
रात हो या दिन माँ को सोते नहीं देखता
सोचता था कि हम माँ के बच्चे ही सोते हैं
माँ लोग तो सिर्फ़ प्यार करने के लिये होते हैं
कभी रात को नीद खुलती भी तो, हमेशा मुझे ठण्ड से बचाती दिखती
चादर, रजाई या कभी कम्बल उड़ाती दिखती
कभी उसे खुद के लिये कुछ मांगते या कुछ खुद के लिये करते नहीं देखता
फिर भी वो हमेशा हँसती हमेशा मुस्कुराती रहती
धूप हो या छाँव हमें अपने गले से लगाती दिखती
हमारी ख़ुशी मैं खुश हो जाती हमें चोट लगे तो वो आंसूँ बहाती दिखती
हम शायद बड़े हो गए काफी बदल गए पर वो आज भी न बदली है
जाने किस मिट्टी की बनी है वो, जहां के लोग सारे लगते उसे अपने ही बच्चे हैं
चाहे कितनी बुराई हो हममे पर हम आज भी लगते उसे अच्छे हैं
हिन्दू रोये या मुस्लिम उसकी आँख आज भी छलक आती है
कोई भी बच्चा हँसता है वो उसके साथ आज भी मुस्कुराती है
जादू की छड़ी तो नहीं, पर शायद जिस मिट्टी से वो बनी उसमें ही एक करिश्माई है
आज भी चोट लगने पर जो पहला शब्द निकलता है, उस माँ शब्द में ही सारी सृष्टि समाई है
पुष्पेश, 26 जनवरी 2010
Thursday, November 5, 2009
इश्क क्या है
इश्क क्या है
मज्हब है किसी मुल्क का
या गाली है एक समाज की
दुआ है किसी पीर की
या श्राप किसी साधू का
जीने वाले तो इसे मज्हब की तरह जीते हैं
दुनिया वाले इसे एक गाली समझते हैं
और इश्क करने वाले दीवाने, दुआ किसी फ़कीर की
जाने क्या बात है इसमें, हर लम्हा दर्द चाहता है
फिर भी ये वो नशा है जो कोई दीवाना छोड़ने को तैयार नहीं
जब साथ होते हैं तो जुदाई का वो ख्याल दर्द देता है
और जुदाई के बाद उम्र भर साथ न रहने का गम साथ रहता है
फिर भी लोग इस मह को दीवानों की तरह पीते हैं
कोई भी हाल हो इश्क करते और मुस्कुराते हुए जीते हैं
मैंने भी किया था इश्क कभी. आज भी उन लम्हों को जीता हूँ
जाने क्या सोचता हूँ थोड़ी भुलाता और कुछ ज्यादा पीता हूँ
कुछ भी तो याद नहीं ऐसा जो मैं भुला पाया हूँ
वो लम्हे जो हैं कुछ बीते हुए उन्हें तब भी जिया था आज भी जी रहा हूँ
जाता हूँ आज भी जब उस पीर की दरगाह पे जहाँ दुआ माँगी थी हमने साथ होने की
देखता हूँ कि मजहब नहीं बदला बस किरदार बदल गए हैं
आज भी वहाँ कोई पुष्पेश दुआ माँगता, धागा बाँधता सा दिख पड़ता है
और कोई तुम जैसा साथ आता, चादर चडाता सा दिख पड़ता है
मजहब ही है कोई जो लोग आज भी जी रहे हैं या
दुआ है किसी पीर की मह में डुबोई हुई
जिसे कल भी उसी कशिश से पिया था और आज भी उसी मज्हब की तरह पी रहे हैं
पुष्पेश
नवम्बर 5th 2009
मज्हब है किसी मुल्क का
या गाली है एक समाज की
दुआ है किसी पीर की
या श्राप किसी साधू का
जीने वाले तो इसे मज्हब की तरह जीते हैं
दुनिया वाले इसे एक गाली समझते हैं
और इश्क करने वाले दीवाने, दुआ किसी फ़कीर की
जाने क्या बात है इसमें, हर लम्हा दर्द चाहता है
फिर भी ये वो नशा है जो कोई दीवाना छोड़ने को तैयार नहीं
जब साथ होते हैं तो जुदाई का वो ख्याल दर्द देता है
और जुदाई के बाद उम्र भर साथ न रहने का गम साथ रहता है
फिर भी लोग इस मह को दीवानों की तरह पीते हैं
कोई भी हाल हो इश्क करते और मुस्कुराते हुए जीते हैं
मैंने भी किया था इश्क कभी. आज भी उन लम्हों को जीता हूँ
जाने क्या सोचता हूँ थोड़ी भुलाता और कुछ ज्यादा पीता हूँ
कुछ भी तो याद नहीं ऐसा जो मैं भुला पाया हूँ
वो लम्हे जो हैं कुछ बीते हुए उन्हें तब भी जिया था आज भी जी रहा हूँ
जाता हूँ आज भी जब उस पीर की दरगाह पे जहाँ दुआ माँगी थी हमने साथ होने की
देखता हूँ कि मजहब नहीं बदला बस किरदार बदल गए हैं
आज भी वहाँ कोई पुष्पेश दुआ माँगता, धागा बाँधता सा दिख पड़ता है
और कोई तुम जैसा साथ आता, चादर चडाता सा दिख पड़ता है
मजहब ही है कोई जो लोग आज भी जी रहे हैं या
दुआ है किसी पीर की मह में डुबोई हुई
जिसे कल भी उसी कशिश से पिया था और आज भी उसी मज्हब की तरह पी रहे हैं
पुष्पेश
नवम्बर 5th 2009
Thursday, July 16, 2009
Star
everybody is a star hiding so many things in them, one who let it come out looks diff and we call it as star.
Pushpesh Pandey
July 17, 2009
Pushpesh Pandey
July 17, 2009
Monday, April 27, 2009
बस वो इंसान बदल गया है …………………..
खता क्या थी उस कैफ की
इज़हारे मुहब्बत ही तो किया था
दुनिया ने जो यूं मारे पत्थर
ऐसा क्या उसने गुनाह किया था
अजब दस्तूर है दुनिया का
लुटवा दी जिन तमाशबीनों ने अस्मतें
जाने कितनी जानें गयी जिंदगियां फ़ना हुईं
कितनो ने खोया बचपन जिनकी वजह से
आज वो ही इस वतन के सरपरस्त तलबगार बने हैं
चड बैठे हैं तानाशाह बन कर
आज हमारे मसलों में मददगार बने हैं
किससे शिकायत करे किससे दोस्ती चाहे
ये गलतियाँ भी हमारी तो नहीं
किसने बनाया खुदा फैसला करने को हमारी किस्मत का
किसने इन्हें ताजो तख्त से नवाजा
भूल गए हम वो होली का रंग वो ईद की सिवईयां
वो मुहर्रम का जुलुस
सब साथ शरीक होते थे मिल बाँट के मनाते थे
सुख हो या दुःख हर लम्हा साथ बिताते थे
फिर कुछ हिन्दू का धरम बटा
किसी मुस्लिम ने चाँद को हथिया लिया
ऊपर वाले ने तो कुछ नहीं कहा सुना
बाटने वाले ने माँ का कलेजा ही बाट लिया
बचपन में जिसे सब अम्मी कहते थे बड़े चाव से
आज वो एक मुस्लिम दुश्मन की माँ हो गयी
और जो माँ हर घर की शान थी
वो काफिर खातून के नाम से नवाजी गयी
वो जहा थे वही हैं उनका झगडा आज भी उस कुर्सी का है
भाई भाई जो साथ में खाते थे एक थाली में, बस वो इंसान बदल गया है
न तो उसका अल्लाह बदला न मेरा भगवान्, बस वो हिन्दू वो मुस्लमान बदल गया है
पुष्पेश पाण्डेय, अप्रैल 27
इज़हारे मुहब्बत ही तो किया था
दुनिया ने जो यूं मारे पत्थर
ऐसा क्या उसने गुनाह किया था
अजब दस्तूर है दुनिया का
लुटवा दी जिन तमाशबीनों ने अस्मतें
जाने कितनी जानें गयी जिंदगियां फ़ना हुईं
कितनो ने खोया बचपन जिनकी वजह से
आज वो ही इस वतन के सरपरस्त तलबगार बने हैं
चड बैठे हैं तानाशाह बन कर
आज हमारे मसलों में मददगार बने हैं
किससे शिकायत करे किससे दोस्ती चाहे
ये गलतियाँ भी हमारी तो नहीं
किसने बनाया खुदा फैसला करने को हमारी किस्मत का
किसने इन्हें ताजो तख्त से नवाजा
भूल गए हम वो होली का रंग वो ईद की सिवईयां
वो मुहर्रम का जुलुस
सब साथ शरीक होते थे मिल बाँट के मनाते थे
सुख हो या दुःख हर लम्हा साथ बिताते थे
फिर कुछ हिन्दू का धरम बटा
किसी मुस्लिम ने चाँद को हथिया लिया
ऊपर वाले ने तो कुछ नहीं कहा सुना
बाटने वाले ने माँ का कलेजा ही बाट लिया
बचपन में जिसे सब अम्मी कहते थे बड़े चाव से
आज वो एक मुस्लिम दुश्मन की माँ हो गयी
और जो माँ हर घर की शान थी
वो काफिर खातून के नाम से नवाजी गयी
वो जहा थे वही हैं उनका झगडा आज भी उस कुर्सी का है
भाई भाई जो साथ में खाते थे एक थाली में, बस वो इंसान बदल गया है
न तो उसका अल्लाह बदला न मेरा भगवान्, बस वो हिन्दू वो मुस्लमान बदल गया है
पुष्पेश पाण्डेय, अप्रैल 27
Saturday, March 28, 2009
ये ग़ज़ल क्या है ............
सुन रहा था ध्यान से ग़ज़ल बैठा, तो उसने पूछा
सुनते हो बड़े ध्यान से, ये ग़ज़ल क्या है
मैंने कहा,
अल्फाज़ हैं किसी शायर के लिखे
या तस्स्वुर है, ये मेरी जिंदगी का
एसी ही कुछ गज़लें मैंने अपनी यादों में सजायी हैं
सुनता हूँ तो लगता है, जैसे आइना देख रहा हूँ मैं
जिंदगी के कई पल उस शायर ने शब्दों में ढाल रखे हैं
जानता था वो क्या मेरे बारे में, कैसे इतना
या मेरी तरह वो भी गम का शौकीन था
या बना दिया था जिंदगी के हालात ने उसे
गमों का कुछ शौकीन यूँ मेरी तरह
अल्फाज नहीं हैं महज
दास्तान हैं इस जिंदगी की, उन ग़ज़लों में
वही गज़लें सजा के रखी हैं
वरना ग़ज़ल क्या है, अल्फाज़ हैं कुछ शायर के लिखे.....
पुष्पेश पाण्डेय, मार्च 29
सुनते हो बड़े ध्यान से, ये ग़ज़ल क्या है
मैंने कहा,
अल्फाज़ हैं किसी शायर के लिखे
या तस्स्वुर है, ये मेरी जिंदगी का
एसी ही कुछ गज़लें मैंने अपनी यादों में सजायी हैं
सुनता हूँ तो लगता है, जैसे आइना देख रहा हूँ मैं
जिंदगी के कई पल उस शायर ने शब्दों में ढाल रखे हैं
जानता था वो क्या मेरे बारे में, कैसे इतना
या मेरी तरह वो भी गम का शौकीन था
या बना दिया था जिंदगी के हालात ने उसे
गमों का कुछ शौकीन यूँ मेरी तरह
अल्फाज नहीं हैं महज
दास्तान हैं इस जिंदगी की, उन ग़ज़लों में
वही गज़लें सजा के रखी हैं
वरना ग़ज़ल क्या है, अल्फाज़ हैं कुछ शायर के लिखे.....
पुष्पेश पाण्डेय, मार्च 29
Saturday, February 7, 2009
जिंदगी क्या है..................
जिंदगी क्या है,
मसला है एक उलझा हुआ
या फिर कुछ उलझे रिश्तों के ताने बाने का
जो सुलझता भी है फिर उलझता, और फिर सुलझता सा दिखाई पड़ता है
जाने क्या सोचता हूँ
सुलझाने बैठता हूँ इसे जितना
उतना ही उलझ जाता हूँ
आज फिर जब इसे सुलझाने बैठा, फिर उतना ही उलझ गया
याद आती है बचपन की पतंग वाली वो चरखी
जिसमे डोर अक्सर उलझ जाया करती थी
सुलझाने की लाख कोशिश करता था उसको
पर वो कोशिश हर बार एक नयी कोशिश की वजह दे जाती थी
जिंदगी कहीं वही चरखी तो नहीं
या वो एक पहिया है साइकिल का
जो चलता रहता है, घूमता रहता
जब तक उसका सफ़र पूरा नहीं होता
और गर रुक गया तो फिर नए सफ़र की तलाश में निकल पड़ता है
समझ नहीं पाया हूँ कि जिंदगी क्या है
लगता है मसला एक उलझा हुआ...........
पुष्पेश पाण्डेय, फरवरी 8
मसला है एक उलझा हुआ
या फिर कुछ उलझे रिश्तों के ताने बाने का
जो सुलझता भी है फिर उलझता, और फिर सुलझता सा दिखाई पड़ता है
जाने क्या सोचता हूँ
सुलझाने बैठता हूँ इसे जितना
उतना ही उलझ जाता हूँ
आज फिर जब इसे सुलझाने बैठा, फिर उतना ही उलझ गया
याद आती है बचपन की पतंग वाली वो चरखी
जिसमे डोर अक्सर उलझ जाया करती थी
सुलझाने की लाख कोशिश करता था उसको
पर वो कोशिश हर बार एक नयी कोशिश की वजह दे जाती थी
जिंदगी कहीं वही चरखी तो नहीं
या वो एक पहिया है साइकिल का
जो चलता रहता है, घूमता रहता
जब तक उसका सफ़र पूरा नहीं होता
और गर रुक गया तो फिर नए सफ़र की तलाश में निकल पड़ता है
समझ नहीं पाया हूँ कि जिंदगी क्या है
लगता है मसला एक उलझा हुआ...........
पुष्पेश पाण्डेय, फरवरी 8
Saturday, November 1, 2008
ज़बान नहीं है कोई..........................
आज महफिल मैं तनहा खड़ा था
तो आईने में एक शायर मिला
देखा मुझको फिर पूछा
कि क्या तुम भी लिखते हो
मैंने कहा, लिखता तो नहीं
हाँ कुछ तस्वीरे आती हैं जहन में
उन्हें कागज पे उतार लेता हूँ
उसने पूछा, ज़बान क्या है तुम्हारी
मैंने कहा
तस्वीरे हैं कुछ बीते पल की
और ख़याल कुछ लम्हों के
वो ही कागज पे उतारे हैं
ज़बान नहीं है कोई
ज़बान में लोग मजहब ले आयेंगे
और फिर उसमे कई रिश्ते भी बुन्वायेंगे
जबान नहीं है कोई, कुछ लकीरे हैं आड़ी तिरछी
दिल की नज़र से देखो तो नज़र आएँगी
देश ज़बान या किसी सरहद की मोहताज नहीं
ख़याल है जहन का कागज़ पे उतरा हुआ
दिल लगाओगे तो तस्वीर बनती ही चली जायेगी
ज़बान नहीं है कोई..........................
पुष्पेश
नवम्बर ०२/२००८
तो आईने में एक शायर मिला
देखा मुझको फिर पूछा
कि क्या तुम भी लिखते हो
मैंने कहा, लिखता तो नहीं
हाँ कुछ तस्वीरे आती हैं जहन में
उन्हें कागज पे उतार लेता हूँ
उसने पूछा, ज़बान क्या है तुम्हारी
मैंने कहा
तस्वीरे हैं कुछ बीते पल की
और ख़याल कुछ लम्हों के
वो ही कागज पे उतारे हैं
ज़बान नहीं है कोई
ज़बान में लोग मजहब ले आयेंगे
और फिर उसमे कई रिश्ते भी बुन्वायेंगे
जबान नहीं है कोई, कुछ लकीरे हैं आड़ी तिरछी
दिल की नज़र से देखो तो नज़र आएँगी
देश ज़बान या किसी सरहद की मोहताज नहीं
ख़याल है जहन का कागज़ पे उतरा हुआ
दिल लगाओगे तो तस्वीर बनती ही चली जायेगी
ज़बान नहीं है कोई..........................
पुष्पेश
नवम्बर ०२/२००८
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